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IREF® Real Estate in India - Property Discussion
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Old May 17 2012, 05:05 AM   #2781
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Government mulls denotification of land in North-West Delhi villages


NEW DELHI: The Delhi government is planning to denotify 500 acres of land, which it had acquired from 1000-odd farmers to develop a housing project. The land was notified in 2006 and a portion of the first phase of the Narela project was supposed to come up there. However, the government failed to award the special rehabilitation package of nearly Rs 100 crore to the farmers, forcing them to rise up in protest. Now, with the denotification, the farmers might get back their land.

Last October, Delhi high court had asked the government to award the package money to farmers by December 2011. But since the government didn't pay, the farmers filed a contempt petition against the government in the high court.

On May 14, land and building minister Raj Kumar Chauhan had sent the file pertaining to the acquisition to the office of CM Sheila Dikshit. He requested her to forward the same to LG Tejendra Khanna so that clearance to de-notify land in the five villages - Singhu, Alipur, Bakholi, Mamoorpur and Tikri Khurd-could be obtained. In his letter, Chauhan blamed Delhi Development Authority for not releasing the fund money.

"DDA has not shown the intention to take over this land as they are making issues in release of special rehabilitation package as compensation, while the land rates as per the market information are manifold. In this scenario, we may request the LG to denotify the said piece of land and give it back to the farmers," states the letter attached with the acquisition file marked to CM's office on Monday.

But DDA had earlier put the ball in the government's court, saying that as per the existing policy guidelines, it could only pay the amount awarded by the land acquisition collector; this being a special package cleared by Delhi cabinet, it was the urban development ministry's responsibility.

"This special rehabilitation package is not part of awardees amount. It was, therefore, suggested that the government would take up the matter with urban development ministry to grant special dispensation and to authorize DDA to pay the special rehabilitation package," reads the letter sent by DDA to government on April 20.

Amid this infighting between the two agencies, farmers have only received Rs 29.15 lakh per acre till date when the market rate is Rs 2 crore per acre. "We would be more than happy if the government denotifies our land and gives it back to us," said Balu Ram Pradhan, a farmer from Tikri Khurd village.

In September 2008, amid massive demonstrations by farmers, Sheila Dikshit's government had announced a one-time special package for farmers whose lands had been acquired. It was not until December 18, 2007 that the award was finally announced.

Farmers were promised a higher compensation on the basis of a rate approved by the cabinet at Rs 53 lakh per acre, plus solatium at 30% and interest at 12.5% per year after suitable adjustments for 2005 and 2006.

Times View

This is a case where government inefficiency means that somebody else has to pay the price. Fairness demands that the farmers can't simply be given back the land in return for the money they received as compensation for its acquisition. Quite apart from the fact that many or all of them might have spent the money by now, who is to compensate them for the

loss of livelihood for the last six years? So, the government must make good that loss to them. But that would mean the taxpayer foots the bill. The bottomline is that fertile land of extremely high value both for agriculture and for other purposes has simply been allowed to lie idle for six years. Accountability for this mess must be fixed and action taken

TOI

 
Old May 17 2012, 05:09 AM   #2782
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यूपीएसआईडीसी के एमडी को एक महीने की सजा

जिला उपभोक्ता अदालत ने उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम (यूपीएसआईडीसी) के प्रबंध निदेशक को एक महीने कारावास की सजा सुनाई है। न्यायालय ने एमडी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया है। शहर में भूखंड आवंटन और निरस्तीकरण से जुड़ी प्रक्रिया में गड़बड़ी करने के कारण न्यायालय ने 16 दिसंबर, 2002 को आवंटी के पक्ष में आदेश दिया था।

जिसके खिलाफ निगम ने राज्य आयोग, राष्ट्रीय आयोग और सुप्रीम कोर्ट में अपील की लेकिन, तीनों अदालतों ने आवंटी के पक्ष में ही फैसला सुनाया। अब आदेशों का अनुपालन नहीं करने पर मंगलवार को जिला उपभोक्ता फोरम ने निगम के एमडी को एक महीना कारावास की सजा सुनाई है।

सरिता विहार (नई दिल्ली) की रहने वाली शबनम खुराना को यूपीएसआईडीसी ने ग्रेटर नोएडा में 22 अक्टूबर, 1992 को 600 वर्ग मीटर का एक औद्योगिक भूखंड आवंटित किया था। भूखंड की पूरी कीमत चुकाने पर आवंटी ने 10 नवंबर, 1994 को कब्जा ले लिया। किन्हीं कारणों से आवंटी भूखंड को क्रियाशील नहीं कर सकी।

निगम ने 17 सितंबर, 1999 को आवंटन रद्द कर दिया। शबनम खुराना ने भूखंड के रेस्टोरेशन के लिए आवेदन किया लेकिन, निगम ने पांच अक्टूबर, 2000 को पत्र भेजा कि रेस्टोरेशन पॉलिसी 29 सितंबर, 1999 को परिवर्तित हो गई है। जबकि, आवंटी ने 11 सितंबर, 2000 को भी एक पत्र निगम को लिखा था। जिसमें हालिया दरों पर आवंटन रेस्टोर करने का निवेदन किया था।

जब निगम ने कोई सुनवाई नहीं की तो आवंटी ने जिला उपभोक्ता अदालत में वाद दायर कर दिया। इसी बीच निगम ने यह प्लॉट किसी अन्य को आवंटित कर दिया। अदालत ने आवंटी के पक्ष को सही माना और 16 दिसंबर, 2002 को आदेश दिया कि वादी को 600 वर्ग मीटर का कोई अन्य भूखंड उसी स्थान पर नई दर से आवंटित कर दिया जाए।

पूर्व में जमा की गई धनराशि समायोजित कर ली जाए। अगर वादी भूखंड नहीं लेना चाहती है तो निगम 30 दिन में जमा धनराशि लौटाए। धनराशि से 10 प्रतिशत पेनल्टी काटकर बाकी पर 12 प्रतिशत ब्याज दे। निगम इस आदेश के खिलाफ पहले राज्य आयोग और फिर राष्ट्रीय आयोग गया लेकिन दोनों अदालतों ने जिला अदालत के निर्णय को सही करार दिया।

इसके बाद निगम ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की। जिसे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीएस चौहान और जस्टिस जगदीश सिंह खेहर ने खारिज कर दिया। इसके बावजूद निगम अधिकारियों ने आदेशों का पालन नहीं किया। जिस पर शबनम खुराना ने जिला उपभोक्ता फोरम में फिर शिकायत की।

मंगलवार को न्यायालय ने माना कि निगम के अधिकारी जान बूझकर देरी कर रहे हैं। फोरम के अध्यक्ष मूलचंद शुक्ला और सदस्य विभा द्विवेदी ने एकमत होकर निगम के प्रबंध निदेशक को एक महीने का कारावास सुनाया है। दो हजार रुपए का जुर्माना किया है। एमडी को गिरफ्तार करने के लिए वारंट जारी किए हैं।

निगम ने कहा उपभोक्ता नहीं आवंटीयूपीएसआईडीसी ने जब नेशनल कंज्यूमर कोर्ट में अपील की तो तर्क दिया कि आवंटी को उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं माना जा सकता है। आवंटी ने व्यवसायिक और औद्योगिक गतिविधियों के लिए भूखंड खरीदा था।

ऐसे में जिला उपभोक्ता फोरम का आदेश रद्द करने योग्य है। इस पर आवंटी के अधिवक्ता ने प्रतिरोध किया और न्यायालय को बताया कि नेशनल कमीशन का निर्णय यूपी आवास एवं विकास परिषद बनाम गरिमा शुक्ला एवं अन्य, 1991, सीपीजे 1 का हवाला दिया। जिसे न्यायालय ने सही माना और आवंटी को उपभोक्ता करार दिया।

11 साल तक चला मुकदमाशबनम खुराना ने यह मामला 11 साल तक लड़ा। जिसके बाद उन्हें राहत मिली है। सबसे पहले वर्ष 2001 में जिला उपभोक्ता अदालत में वाद दायर किया। उसके बाद निगम की अपील पर राज्य आयोग ने 25 अप्रैल, 2007 को निर्णय दिया।
राष्ट्रीय आयोग ने 14 जुलाई, 2011 को निर्णय सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने 16 अप्रैल, 2012 को निगम की एसएलपी खारिज की। अब 15 मई, 2012 को पुन: जिला उपभोक्ता अदालत ने कार्यवाही का आदेश दिया है।

Hindustan
 
Old May 17 2012, 05:25 AM   #2783
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छोटे उद्योगों की स्कीम लाए प्राधिकरण

नोएडा। नोएडा एंट्रेप्रिन्योर्स एसोसिएशन ने प्राधिकरण के चेयरमैन को पत्र लिखकर फॉर्म हाउस के लिए आवंटित भूखंडों को तत्काल रद्द कर छोटे उद्योगों के लिए नई योजना लाने की मांग की है। इन भूखंडों पर लगने वाले उद्योगों में 10 फीसदी रोजगार किसानों के बच्चों को दिया जाएगा। मांग न माने जाने पर कोर्ट जाने की चेतावनी भ्‍ाी दी गई है।
एसोसिएशन के अध्यक्ष विपिन मल्हन ने चेयरमैन को लिखे पत्र में कहा है, कि नोएडा प्राधिकरण की स्थापना नोएडा को उद्योग नगरी के रूप में बसाने के लिए हुई है। कृषि योग्य जमीन का अधिग्रहण भी उसी मकसद के लिए किया जा सकता है। किसानों की जमीन को कुछ रसूखदारों को प्राधिकरण आवंटित कर लाभ पहुंचा रहा है। उनका कहना है कि अगर इन भूखडों पर छोटे और मझोले उद्योगों की स्कीम लाई जाए तो इससे शहर का विकास होगा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि इन उद्योगों दस फीसदी रोजगार किसानों के बच्चों को दिया जाएगा।
नोएडा एंट्रेप्रिन्योर्स एसोसिएशन का चेयरमैन को पत्र लिखकर की मांग
उद्योगों में 10 फीसदी रोजगार किसानों के बच्चों को देने का वादा
 
Old May 17 2012, 08:27 AM   #2784
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Real Estate marketing tips for smaller developers


Despite the market slowdown and high competitiveness among the 'Big Boys' in the Indian residential real estate business, smaller builders of residential projects can still corner a healthy market share. It is all a matter of knowing which league to play in, and how to play.


For starters, such developers should build at the best location within their means. Often, smaller builders do not have the luxury of picking and choosing locations for their projects. When they are stuck with a less-than-optimum location, they can compensate by making their project a landmark in the area. This means beefing up its saleability with better amenities and sweetening the deal with competitive rates. If one cannot get into Big League, one can still strive to be the best in Little League. Buyers always look for the best available in every budget range.


Brand Clout


It is difficult to compete with high profile 'brand' names. Without a doubt, a developer derives numerous advantages from his brand name and brand image. He is automatically clubbed among the most reputable professionals in the field, wields greater clout with financial institutions, and can attach higher rates to his residential projects. However, a brand name does not come from nowhere - a reputed developer’s projects sell well on the basis of reliable construction, imaginative design, the provision of desirable amenities, good project locations and honesty in dealings.


In the light of this, a smaller developer should focus on incorporating into his projects as many elements of the brand formula without getting fixated on building an 'brand'. It should be borne in mind that in the residential real estate arena, a developer’s image is often based on how well his projects sell. To begin with, that should be the primary focus.


Rather than aiming to take on the Big Boys on their own turf, a smaller developer can build an image that stands for good quality at competitive rates. Initially, this may mean offering lower rates on first projects rather than losing customers. It may mean agreeing to payment terms that are more oriented to the customer's convenience than those of the builder.


While established developers have an advantage with selling their projects, a smaller, new developer can beat the odds even if his project shares the same locality with that of a major name. He can do so by offering a degree of service that most other builders would not even consider rendering. This might mean cutting down on the time it takes to complete legal formalities of a purchase and offering innovative payment schemes.


Creative Pricing Strategies


Innovative financial structuring schemes are tailored to suit the needs of clients, and are a valid and effective method of adding real value in a changing world of residential property market dynamics. Some of the schemes that have worked well in the past are:


- Offering buyers the option of renting a flat at a minimum monthly rent, along with a specified deposit and a three-year lock-in period, with the option of buying the rented flat at a later date. If the purchase happens, the payments made are then treated as down-payments. This allows the flat’s occupier to either continue on a rental basis or to buy a flat they have grown familiar with at a date when the rates would conceivably have sunk to more rational levels.


- Taking a down payment on under-constructions flats in the builder’s on-going projects and offering to pay back the difference in the current and future market rates should the market correct at a later stage.


- Offering to shoulder part of the interest rate on the buyer’s home loan for a year, subject to a lock-in period of three years.


Such innovative financial structuring offers have proved effective in encouraging the absorption of existing ready inventory and increasing bookings in under-construction projects.


The Personal Touch


On a more general note, a smaller developer benefits considerably by extending a personal touch. Rather than delegating inquiries to underlings, he can personally take telephone calls, use his personal email ID to answer mail and take time off to explain some of the technicalities of the property market to prospective customers. Buyers respond very favourably to such personal attention by a developer.


There is no sure-fire, catchall modus operandi as far as success on the residential real estate market is concerned. It might work that way some of the time, but not always. Special situations call for special measures. In every critical marketing situation, the solution lies in 'lateral thinking' - taking a chance with uniquely different approaches.


Professional Marketing

When no formulas of promotion and sale prove effective, professional real estate consultants can turn around the fortunes of smaller developers by virtue of creative and innovative ideas. Once the concept of 'thinking out of the box' is understood, effective ideas to tackle most market contingencies can be conceived and implemented - often with dramatic results.

Moneycontrol.com
 
Old May 17 2012, 08:27 AM   #2785
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Reverse mortgage smart option for post-retirement cash flow


The reverse mortgage scheme has been approved recently by the government through which a retired couple can generate regular cash flow from their home by borrowing against it to meet their living expenses. They will continue to stay in their home as long as both are alive. The mortgage company will sell the property after their death and recoup the investment.


A reverse mortgage is an important tool for retired couples who have either no children or have children who are not in a position to support them financially, and who are themselves running out of accumulated savings.


In terms of financial language, reverse mortgage can be defined as, “an agreement by which a homeowner borrows against the equity in his home and receives regular tax-free payments from the lender.” Here equity is the value of the property over and above any mortgage or other liabilities relating to it. Thus, reverse mortgage is a contract between a homeowner and a financier (a few nationalised banks at present offer the product) that enables the homeowner to receive a steady stream of income, especially during his retirement years, from the future realisable value of the home.


The origin of reverse mortgage can be traced to developed countries where due to higher standards of living, better access to healthcare and higher life expectancy, people above 65 years account for a major chunk of the population. The ever-rising cost of pensions and healthcare for senior citizens led insurance companies to introduce the reverse mortgage product in the US, the UK and Australia.


For reverse mortgage, the capital value of a home is converted into an annuity over the homeowner’s lifetime. The annuity may be designed to rise, fall or stay steady over the lifetime. The period of such payments is not “a specified number of years”, but, “the remaining lifetime of the owner (and his/her spouse) of the property”. Simply put, reverse mortgage is a life annuity.


Thus, by investing in a house through a housing loan and repaying the loan during one’s working life, one will not only have a roof over his head throughout his life, but also, secure a joint life pension that keeps pace with inflation after retirement.


How reverse mortgage works: Mr Raj retired after having a very successful career with a leading private sector bank. His only daughter is married and well settled in Gurgaon. He owns a large house in Delhi that is worth about Rs 75 lakh, but, he has limited savings (including PPF and EPF) of Rs 12 lakh to generate any major income.


He is not expecting any pension either. His worry now is to pay for his modest monthly expenses of Rs 22,000. His financial assets can at best generate Rs 12,000 per month, but, the income generated will not keep pace with inflation. Thus, after five years, when he will require Rs 28,000 per month, his financial assets will still generate only Rs 12,000 per month.


The popularity of the instrument lies in the fact that it converts an illiquid asset — the house — into liquid cash flows for the homeowner.


As the name indicates, a reverse mortgage, operates in a manner opposite to that of a typical mortgage such as a home loan.


All along, you pledge the asset, namely, the home you have bought with the loan from the bank. This asset is the security against which the bank is lending to you. In reverse mortgage, you pledge a property you already own (with no existing loan outstanding against it). The bank in turn gives you a series of cash flows for a fixed tenure. These can be thought of as reverse EMIs.


Although, in India, we as individuals, our families are emotionally attached to one big asset called “a house”, but, going forward, where nuclear families are on the rise, a reserve mortgage can act as a lifesaver for many senior citizens and couples living alone.
Financial Chronicle

 
Old May 17 2012, 08:27 AM   #2786
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‘Cops favouring real estate agents’


Police stations that have names of sponsors on their signboards or hoardings within the station premises will have to remove these. The National Human Rights Commission informed Gujarat police about this issue after observations by dalit activists and allegations of police giving undue favours to land mafias.


NHRC members, after meeting dalit victims and NGOs, opined that cops might be giving undue favours to real estate companies like Tulja Estate who sponsor signboards of police stations. Their names are also written on the signboards. Some trading companies too get their names written on such boards.Dalit activist Raju Solanki raised this issue on Monday and alleged that cops act as agents to these real estate firms, which eventually try to influence people with their 'contact'. He said this in an open forum in the presence of NHRC chairperson KG Balakrishnan and other members including BC Patel.


Reacting to this issue, in-charge director general of police Chitranjan Singh told DNA that a circular will soon be sent to police stations and such signboards will be removed. He said that the issue was mainly related to Ahmedabad city, where the names of some firms are written on sign boards of police stations. Singh also said that this was done to enhance police-public participation in the area.


NHRC has said that they have been given to understand by the police department that hoardings of private traders will not be displayed at police stations in future. Police sources said that the hoardings are mainly of real estate companies.

DNA
 
Old May 17 2012, 10:32 AM   #2787
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बिल्डरों को रियायत, बाकी के लिए बढ़ाई कीमत


राज्य सरकार बिल्डरों को सस्ती दरों पर प्लॉट दिए जाने पर सवाल खड़े कर रही है। ऐसे में अथॉरिटी वर्ष 2004 से 2011 तक जमीन के रेट तय करने के तरीकों पर उलझ गई है। खासतौर पर वर्ष 2008 से लेकर वर्ष 2011 के बीच जो रेजिडेंशल या हाउसिंग स्कीमें आईं , उनमें आम पब्लिक को छोटे प्लॉट या फ्लैट महंगे आवंटित किए गए। वहीं , बिल्डरों व प्रभावशाली लोगों के लिए आई स्कीम में कैटिगरी बदलकर उन्हें रियायत दी गई। अब जब राज्य सरकार ने ग्रुप हाउसिंग और फार्महाउसों की जांच शुरू कर दी है , ऐसे में रेट तय करने के तौर तरीके खास तौर पर जांच टीम के निशाने पर होंगे।

छोटे प्लॉटों की स्कीम : तीन गुना रेट वसूला
वर्ष 2004 में छोटे रिहायशी सेक्टरों के लिए लॉन्च स्कीम में प्लॉटों का रेट 3700 रुपये / वर्गमीटर से 11 हजार 200 फार्म हाउस तक था। विवाद में आने के कारण यह स्कीम कैंसल हो गई था। हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में चले विवाद के बाद इस स्कीम का ड्रॉ वर्ष 2008 में कराया गया। तब सफल आवंटी को ये प्लॉट 14 हजार 400 रुपये / वर्गमीटर से 39 हजार 600 रुपये / वर्गमीटर की दर से आवंटित किए गए। इसे लेकर आवंटियों ने आपत्ति की , पर उनकी बात नहीं सुनी गई। कुछ सुप्रीम कोर्ट में गए , पर वहां से आवंटियों ने केस वापस ले लिया। हालांकि , अथॉरिटी से सुप्रीम कोर्ट ने रेट तय करने का आधार पूछा था।

फ्लैटों की स्कीम : 5 साल बाद मिले महंगे फ्लैट

वर्ष 2006 में अथॉरिटी ने ईडब्ल्यूएस , एलआईजी , एमआईजी व एचआईजी कैटिगरी के 2000 फ्लैटों की स्कीम निकाली थी। आवेदकों के लिए शत प्रतिशत पेमेंट का विकल्प रखा गया था। आवेदकों ने अथॉरिटी में पूरा पैसा जमा कराया। इसके बाद अथॉरिटी स्तर से इन फ्लैटों को बनाने में देरी हुई , फिर भी लोगों को कीमत बढ़ाकर फ्लैट आवंटित किए गए। एमआईजी और एचआईजी के लिए करीब 8 से 10 लाख अतिरिक्त चार्ज किया गया। ईडब्ल्यूएस और एलआईजी फ्लैटों का ड्रॉ तो अब तक नहीं हुआ है। यहां भी देरी अथॉरिटी स्तर पर हुई और वसूली पब्लिक से की जा रही है। पब्लिक ने इन फ्लैटों की कीमतें बढ़ाने का भी विरोध किया था , पर कोई सुनवाई नहीं हुई।

अब देखिए ग्रुप हाउसिंग स्कीमों को मिली रियायतें

वर्ष 2006 में अथॉरिटी की ग्रुप हाउसिंग स्कीम का आवंटन ओपन बिड सिस्टम के तहत हुआ था। इसका न्यूनतम रिजर्व प्राइस 28 हजार 800 रुपये / वर्गमीटर के करीब था। बिल्डरों के लिए एफएआर और ग्राउंड कवरेज भी काफी कम था। बिल्डरों ने तब 30 हजार से लेकर 35 हजार रुपये / वर्गमीटर तक में जमीन खरीदी थी। वर्ष 2008 में मंदी के आधार पर अथॉरिटी ने प्राइम सेक्टर व एक्सप्रेस - वे के किनारे ग्रुप हाउसिंग को प्लॉट 20 हजार 400 रुपये / वर्गमीटर की न्यूनतम बिड के आधार पर आवंटित किए गए। इस दौर में न केवल टू बिड सिस्टम को अपनाया गया बल्कि चुनिंदा बिल्डरों ने ही अलग - अलग जगह सेकंड बिडर बनकर आवेदन कर प्लॉट लिए। इन बिल्डरों ने इनकी कीमतें भी ज्यादा नहीं भरी। इस तरह वर्ष 2008 के मुकाबले 2011 में करीब 8 हजार रुपये / वर्गमीटर कम दर से ग्रुप हाउसिंग प्लॉट दिए गए। इनमें एफएआर और ग्राउंड कवरेज भी ज्यादा थे।

फार्महाउस की दरों को लेकर लगातार उठे सवाल

फार्महाउस आवंटन के मामले में शासन ने अथॉरिटी से पूछा है कि जमीन का अधिग्रहण नियमानुसार हुआ है या नहीं , आवंटित भूमि का मूल्य सही है या नहीं और आवंटन प्रक्रिया नियमानुसार है या नहीं। इस सभी पर रिपोर्ट चेयरमैन को शासन के पास भेजनी है। अथॉरिटी में मंथन चल रहा है कि एक्सप्रेस - वे से सटे सेक्टर -44 में अथॉरिटी की ओर से आवंटित 450 वर्गमीटर के प्लॉट की कीमत पौने दो करोड़ की है। वहां से मात्र एक किलोमीटर दूर अथॉरिटी 10 हजार रुपये वर्गमीटर का प्लॉट 3 करोड़ 10 हजार रुपये में कैसे आवंटित कर रही है।


-Navbharat times
 
Old May 17 2012, 10:33 AM   #2788
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एक करोड़ से ज्यादा के विकास कार्यों पर रोक

नोएडा

बीएसपी सरकार के कार्यकाल में जारी किए गए एक करोड़ रुपये से ज्यादा के विकास कार्य नई सरकार ने रोक दिए गए हैं। इससे गांवों में चल रहे विकास कार्यों के पूरे होने पर सवालिया निशान लग गया है। कई गांवों में सीवर लाइनें खुदी पड़ी हैं, लेकिन अथॉरिटी उन्हें भर नहीं रही है। वहीं कई गांवों में आरसीसी रोड और नालियों की मरम्मत का काम चल रहा था। लेकिन अथॉरिटी का फरमान आते ही ठेकेदारों ने पैसा फंसने के डर से सारा काम तुरंत रोक दिया है। इससे ग्रामीणों में रोष व्याप्त है।

अथॉरिटी का कहना है कि इन ठेकों के आवंटन में धांधलियों की शिकायतें मिली हैं। लिहाजा जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक इन ठेकों के काम रोकने के निर्देश दिए गए हैं। जो ठेके आंतरिक जांच में क्लीयर होते जाएंगे, उनके कामों की धनराशि जारी होती रहेगी। वहीं गांवों के प्रधानों ने अथॉरिटी के इस रवैये पर नाराजगी जताते हुए काम शुरू करवाने की मांग की है। उनका कहना है कि अथॉरिटी काम पूरा होने के बाद ही ठेकों के पैसे जारी करती है। इसलिए अथॉरिटी इन कामों को रोके बिना अपनी जांच करती रहे। जिन ठेकांे के आवंटन या काम की गुणवत्ता में गड़बड़ी मिले, उनके पैसे रोक लिए जाएं और जो सही मिले, उनके पैसे जारी कर दिए जाएं।

उन्होंने इस बात पर भी ऐतराज जताया कि अथॉरिटी का फरमान आते ही कई विकास कार्य खतरनाक स्थिति में छोड़ दिए गए हैं। ऐसे में बरसात का पानी भरने या उन गड्ढों में बच्चों के गिर जाने जैसे हादसे हो सकते हंै।

अथॉरिटी के डीसीईओ विजय सिंह यादव ने आश्वासन दिया कि जो काम शुरू हो चुके हैं, उन्हें नहीं रोका जाएगा। लेकिन जो विकास कार्य अभी शुरू नहीं हुए हैं, उन्हें पूरी जांच के बाद ही काम शुरू करने की अनुमति प्रदान की जाएगी।

nbt
 
Old May 17 2012, 09:24 PM   #2789
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जमीन अधिग्रहण की बाधाएं दूर


मुंबई-दादरी डेडीकेटेड रेलवे फ्रेट कॉरिडोर निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण में अब फरीदाबाद जिले से कोई समस्या नहीं रहेगी। रेलवे और संबंधित गांवों के किसानों के बीच जमीन अधिग्रहण पर सहमति बन गई है।
उल्लेखनीय है कि फ्रेट कॉरिडोर के लिए फरीदाबाद जिले के 27 गांवों की जमीन अधिगृहीत होनी है। इन गांवों में गांव फतेहपुर बिल्लोच, प्रहलादपुर, लड़ौली व बहवलपुर के किसान अधिग्रहण सर्वे पर आंदोलनरत थे। किसान उचित मुआवजे की मांग कर रहे थे। उसके लिए किसानों ने जिला प्रशासन के माध्यम से रेलवे प्रशासन को अपनी मांग लिखित रूप में दी थी। 2 अप्रैल 2012 से जिला प्रशासन ने जब जमीन का सर्कल रेट बढ़ा दिया, तो किसानों ने राहत की सांस ली। अब किसानों को रेलवे प्रशासन नए सर्कल रेट से मुआवजा देगा।
गांव फतेहपुर बिल्लोच के किसान मकरंद शर्मा बताते हैं कि चार गांवों के किसानों के आंदोलन का अब क्षेत्र के सभी 27 गांवों के किसानों को फायदा होगा। सभी गांवों की भूमि अब नए सर्कल रेट पर अधिगृहीत की जाएगी। पहले और मौजूदा सर्कल रेट में लगभग दोगुने का अंतर है।
शर्मा के अनुसार, रेलवे के महाप्रबंधक प्रवीण कुमार पिछले दिनों फतेहपुर बिल्लोच गांव में भी आए थे और उन्होंने किसानों की जायज मांग रेलवे के उच्च अधिकारियों तक पहुंचाने का आश्वासन दिया था। उसी के बाद उन्होंने अपने गांवों में भूमि अधिग्रहण का सर्वे होने दिया था। किसानों ने अपने सर्वे फार्म रेलवे विभाग को बल्लभगढ़ के एसडीएम इंद्रपाल बिश्नोई के माध्यम से दिए थे।
एसडीएम इंद्रपाल बिश्नोई का कहना है कि कॉरिडोर के लिए अब सभी 27 गांवों का सर्वे हो चुका है और रेलवे हरियाणा सरकार के तय मापदंड के अनुसार ही भूमि का मुआवजा देगा।



-dainik jagran
 
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Supertech Plans To Raise R3000Cr For Real Estate Projects


funds raised will be used to foray in Gurgaon market with a 10-acre housing project of 600 apartments to be developed in JV with an investment of R400Cr and the remaining will be used to develop ongoing projects including the 50-acre Capetown in Noida.



Incorporated in 1995, Supertech developed various real estate, shopping malls, hotels and information technology parks projects in Delhi, NCR, Meerut, Ghaziabad, Moradabad, Haridwar and Rudrapur.


It has converted more than 33 Mn sq. ft. area of residential and commercial entity into architectural landmarks and more than 36 projects that accommodates nearly 30000 families.

As on March 2012, the company is handling projects worth R14000Cr
Some of its projects are Eco-Village I, II and III, Eco-citi, Emerald Court, 34 Pavilion, Upcountry, Cape Town and Oxford Square, among others.

Supertech recently raised R100Cr from Walton Street Capital for mixed-use project 'Supernova' at Noida.

Other deals in this sector include Paracor Capital invested $20Mn in two residential projects of Chennai-based real estate developer Hallmark Infrastructure recently in April, ASK Property Advisors R40Cr investment in Paranjape Schemes' residential project in Pune and Future Capital's investment in Rustomjee Group's project

DealCurry.com : Supertech Plans To Raise R3000Cr For Real Estate Projects
 
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