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Old June 7 2012, 11:22 AM   #271
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2012 : स्लोडाउन की तरफ बढ़े भारत के पांव
7 Jun 2012, 0710 hrs IST,नवभारत टाइम्स


नई दिल्ली।। भारत और दुनिया फिर से स्लोडाउन की तरफ फिसल रहे हैं। आने वाले दिन हमारे लिए बेहद मुश्किल भरे हो सकते हैं, क्योंकि यह दूसरा स्लोडाउन ज्यादा लंबा और गहरा हो सकता है। फिर यह नौबत ऐसे वक्त आ रही है, जब भारत का हिसाब बुरी तरह गड़बड़ाया हुआ है। तरक्की की रफ्तार थम रही है, सरकार कमजोर दिख रही है, बजट बिगड़ा हुआ है, बाहरी निवेशक भाग रहे हैं और बिजनेस की उम्मीदें टूट रही हैं। सभी एक्सपर्ट मान रहे हैं कि यह हमारी अपनी गलतियों का भी नतीजा है, जिसके लिए दुनिया की खराब हवाओं को कसूरवार नहीं ठहराया जाना चाहिए। संजय खाती की रिपोर्ट :

जीडीपी ग्रोथ रेट
5.3 पर्सेंट रही जीडीपी की ग्रोथ रेट जनवरी से मार्च के बीच। यह पिछले 9 साल में सबसे खराब है। मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ रेट माइनस 0.5 रही, जो पिछले 14 साल में सबसे बुरी है

क्या बीमारी लग गई है इंडिया को

महंगाई
10 पर्सेंट के आसपास है महंगाई। इसकी वजह चीजों की कमी और बढ़ता उपभोग ही नहीं है। सरकार की तरफ से सपोर्ट प्राइस में बढ़ोतरी ने भी महंगाई पैदा की है। अनाज की सरकारी कीमतें बाजार से ऊपर चली गई हैं। गिरते रुपये और दूसरी वजहों से भी कच्चे माल की कीमत चढ़ी है।

नतीजा: इंटरेस्ट रेट घट नहीं पा रहे हैं। कर्ज की लागत ऊंची रहने से हर इकनॉमिक गतिविधि पर बुरा असर पड़ा है।

ट्रेड डिफिसिट
262 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है व्यापार घाटा इस साल। यह जीडीपी के 9 पर्सेंट तक हो गया है। तेल के अलावा गोल्ड के इंपोर्ट ने इस घाटे को बढ़ाया है। सरकार इस असंतुलन को खत्म करने में नाकाम रही है।

बजट घाटा
5.9 पर्सेंट है बजट घाटा। यह सोशल सेक्टर पर भारी खर्च का नतीजा है। इसे जीडीपी ग्रोथ और टैक्स के जरिए घटाने की कोशिशें नाकाम रही हैं, क्योंकि जीडीपी ग्रोथ रेट घट गई है और सरकारी रेवेन्यू बढ़ने के चांस भी। घाटे की भरपाई सरकार और कर्ज लेकर या नोट छापकर करती है, जिससे मनी सप्लाई कम होने लगती है और इंटरेस्ट रेट चढ़ जाते हैं। अब दिक्कत ये है कि स्लोडाउन के बीच अगर सरकार खर्च घटाती है तो उससे इकॉनमी और भी कमजोर होने लगती है।

रुपया
जनवरी से 10.5 पर्सेंट गिर चुका है रुपया। इस दौरान पाकिस्तानी रुपया सिर्फ 4 पर्सेंट गिरा। बांग्लादेशी टका में तो सुधार हुआ है। यूरोजोन में कहर मचा हुआ है, लेकिन यूरो के मुकाबले भी रुपया 9 पर्सेंट गिर चुका है। करंसी की ताकत देश की साख से जुड़ी होती है। रुपये के गिरने का मतलब भारत पर दुनिया के यकीन का घटना है। इससे इंपोर्ट महंगा होता जा रहा है। जिस भी देश का बजट और व्यापार घाटा दोनों ऊंचे होते हैं, उनकी साख सबसे कमजोर पड़ती है और करंसी तबाह होने लगती है।

पूंजी की वापसी
रुपये की कमजोरी के बीच इस बजट में सरकार ने वोडाफोन से वसूली के नाम पर विदेशी सौदों पर पिछली तारीख से टैक्स वसूलने का कायदा लागू कर दिया। विदेशी कंपनियों पर शिकंजा कसने की कोशिश की। इनसे निवेशकों के मन में गहरे संदेह पैदा हो गए और इन्वेस्टमेंट के प्लान ठप पड़ गए। शेयर मार्केट के मूड पर इसका बेहद बुरा असर पड़ा है। वहां से विदेशी पूंजी खिसकती जा रही है।

घटता खजाना
6.4 महीने के इंपोर्ट लायक पैसा बचा है विदेशी मुद्रा भंडार में। पहले यह 14 महीने के बराबर था। ट्रेड डिफिसिट के चलते हालत गंभीर होती जा रही है। इसीलिए कई लोग आज की तुलना 1991 से करने लगे हैं, जब भारत का खजाना लगभग खाली हो गया था और कर्ज की किस्त अदा करने के लिए अपना सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड में गिरवी रखना पड़ा था।

क्या किया जाना चाहिए

1. इंश्योरेंस, रिटेल, एविएशन और पेंशन सुधारों को पास कराया जाए। इससे दुनिया में मेसेज जाएगा कि सुधार थमे नहीं हैं।

2. बुरा लगेगा, लेकिन डीजल के दाम बढ़ाने होंगे। सब्सिडी का यह बोझ इकॉनमी की कमर तोड़ देगा। आज की राहत कल की आफत बन सकती है।

3. इंटरेस्ट रेट फौरन घटाए जाएं। ग्रोथ रेट को सदमा बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। महंगाई रोकने के लिए सरकार दूसरे उपाय करे।

4. जीएसटी और डीटीसी को लागू किया जाए। अकेले जीएसटी के लागू होने से ग्रोथ रेट में एक पर्सेंट से ज्यादा उछाल आ सकता है।

5. इन्फ्रास्ट्रक्चर पर पैसा लगाया जाए। इससे हर सेक्टर में सुधार होगा।

6. पिछली तारीख से टैक्स वसूलने का हक सरकार को है, लेकिन दुनिया को यकीन दिलाया जाए कि ऐसा आम तौर पर नहीं किया जाएगा।

7. किफायत के जरिए बचत के बड़े और ठोस कदम सरकार उठाए।

8. मामलों को लटकाया न जाए। फौरन फैसले लिए जाएं। खास तौर से पर्यावरण के नाम पर योजनाएं अटकी न रहें। तयशुदा वक्त में फैसले हों। सरकार तेजी से काम करती दिखे।

9. आधार के जरिए सीधे जरूरतमंदों तक सब्सिडी पहुंचाने का प्लान तेजी से आगे बढ़े। इससे सरकारी पैसे की लूट खत्म होगी।

10. 1998 के रिसर्जेंट इंडिया बॉन्ड और 2000 के इंडिया मिलेनियम डिपॉजिट की तरह प्रवासी भारतीयों का पैसा लाने के लिए स्कीम शुरू की जा सकती है।

स्लोडाउन के किरदार

सोनिया गांधी
: यूपीए की चेयरपर्सन होने के नाते सरकार की हर पॉलिसी पर उनकी रजामंदी जरूरी है। इससे भी आगे बढ़कर सोनिया ने सरकार का अजेंडा तय करने का काम अपने हाथ में रखा। दिक्कत तब हुई जब उन्होंने जन कल्याण के लिए ऐसी योजनाओं को आगे बढ़ाया, जिनके लिए भारी बजट की जरूरत थी। सोनिया का फोकस सोशल सेक्टर पर है और हर बजट में इसका ख्याल रखा गया। घाटे के बढ़ने में इस फैक्टर का सबसे बड़ा हाथ है। स्लोडाउन ने इस शाहखर्ची की गुंजाइश कम कर दी, लेकिन सरकार ने कदम पीछे नहीं खींचे।

मनमोहन सिंह : अमेरिका से न्यूक्लियर डील को लेकर उन्होंने गजब का हौसला दिखाया, सरकार को दांव पर लगा दिया और यूपीए को साथ चलने पर मजबूर कर दिया। लेकिन दूसरे कार्यकाल में आर्थिक मुद्दों पर वे वैसी मजबूती नहीं दिखा पाए। यहां तक कि गठबंधन की मजबूरी का हवाला देते भी उन्हें सुना गया। जिस शख्स ने भारत में आर्थिक सुधारों की शुरुआत की हो, वही 20 साल बाद उन्हें अनाथ छोड़ने का दोषी ठहराया जा रहा है।

प्रणव मुखर्जी : सबसे अनुभवी माने जाते हैं। 1986 में यूरोमनी ने उन्हें दुनिया का बेस्ट फाइनैंस मिनिस्टर चुना था। लेकिन 2012 में जब स्लोडाउन का खतरा नजर आ रहा था, रुपया कमजोर पड़ रहा था और ग्रोथ रेट थम रही थी, वे बजट में ऐसे प्रपोजल लाए, जिन्होंने कहर बरपा दिया। इस बजट को अब तक का सबसे बुरा बजट ठहराया जा रहा है और मुखर्जी विदेशों के संकट की दुहाई दे रहे हैं।

डी. सुब्बाराव : रिजर्व बैंक के गवर्नर के तौर पर उनका काम है माहौल के हिसाब से पैसे की रफ्तार धीमी और तेज करना। 2008-09 के स्लोडाउन से इकॉनमी बाहर नहीं आई थी, लेकिन उनकी नजर सिर्फ महंगाई पर टिकी रही और वे इसे थामने के नाम पर इंटरेस्ट रेट घटाने से इनकार करते रहे। महंगाई कम नहीं हुई, लेकिन महंगे कर्ज ने उत्पादन की लागत बढ़ा दी और इकॉनमी की रफ्तार रोक दी।

क्या ये कुछ कर सकते हैं


कांग्रेस में जो बात सबसे ज्यादा तय है, उसी को लेकर सबसे ज्यादा सस्पेंस भी है। हर कोई मानता है कि राहुल गांधी उसकी सत्ता के वारिस हैं। लेकिन कोई नहीं जानता कि क्या इसके लिए कोई टाइम-टेबल है, क्या राहुल इसकी तैयारी कर रहे हैं, वह क्या करने वाले हैं और देश की सबसे बड़ी समस्याओं पर उनकी राय क्या है। अगर राहुल युवराज के रोल में हैं तो इस आर्थिक संकट पर उनका नजरिया सामने आना चाहिए। यह उम्मीद की जा रही है कि वह उन भयानक समस्याओं से निपटने के लिए कोई पहल करेंगे, जो उन्हें विरासत में मिल सकती हैं। चुनावी राजनीति में राहुल काफी मंजे हुए खिलाड़ी साबित हुए हैं। लेकिन तरक्की के बड़े अजेंडा पर उनका काम देखना बाकी है। एक लीडर के तौर पर यह राहुल के लिए सबसे बड़ा चैलेंज हो सकता है।

बाहर की बुरी हवाएं

यूरोजोन: ग्रीस की सियासत डरा रही है। अगर वहां विपक्षी जीत जाते हैं और ग्रीस यूरोजोन से बाहर हो जाता है, तो दुनिया भर में ऐसी उथलपुथल मचेगी, जिसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। खुद भीतर से कमजोर भारत तूफानी लहरों में फंसे बिना नहीं रहेगा।

अमेरिका: इस दौर में अमेरिकी इकॉनमी ठीकठाक चल रही है, जिससे दुनिया में उम्मीद बची है। लेकिन अब उसमें भी कमजोरी के संकेत मिल रहे हैं। फिर, ईरान से उसकी तनातनी अगर जंग में बदलती है, तो क्रूड की कीमतें हमें दीवालिया बना देंगी।

चीन: पिछले स्लोडाउन में दुनिया को भारत और चीन की ग्रोथ ने संभाला था। अब चीन की इकॉनमी भी थकती दिख रही है। इससे दुनिया भर में आशंका जाग रही है।

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Old June 11 2012, 03:56 PM   #272
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Icon18 India's Unitech Q4 profit plummets as sales slump

MUMBAI | Wed May 16, 2012 8:42am IST

MUMBAI May 16 (Reuters) - Unitech Ltd, India's No.3 real estate developer by market value, said its quarterly profit slumped 98 percent because of high borrowing costs and a slowdown in house sales.
Thirteen interest rate increases by the central bank between March 2010 and last October to fight inflation have dealt a severe blow to the country's debt-laden developers.
The higher rates pushed up the cost of repayments and deterred potential homebuyers, while companies have also been squeezed by the rising cost of raw materials and slowdown in construction activity.
Net profit fell to 22.6 million rupees ($0.42 million) for the fiscal fourth-quarter ended March 31 from 1 billion rupees a year earlier. Net sales dropped 32 percent to 7.16 billion rupees, the company said late on Tuesday.
Analysts on average had forecast a net profit of 1 billion rupees on sales of 7.56 billion rupees, according to Thomson Reuters I/B/E/S.
Unitech's costs as a percentage of sales rose to 97 percent during the quarter, up from 84 percent in the same period a year previously.
Unitech also holds a near one-third stake in an Indian telecoms joint venture with Norway's Telenor.
The companies are in dispute over Telenor's plan to scrap the venture and migrate its business to a new company after the JV's telecoms permits were ordered to be revoked by India's Supreme Court, which in February declared all permits awarded in a scandal-tainted 2008 sale "illegal and quashed". ($1 = 53.8050 Indian rupees) (Reporting by Aditi Shah; Editing by Ranjit Gangadharan)
 
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