गाजियाबाद : ग्रेटर नोएडा में निजी बिल्डरों के लिए कृषि भूमि अधिग्रहित करने के मामले में पहले ही विवादों में घिरी उत्तर प्रदेश सरकार पर अब एक हाईटेक शहर के निर्माण के लिए गाजियाबाद के 18 गांवों की 8,700 एकड़ भूमि अधिग्रहीत करने पर उंगलियां उठने लगी हैं। इस मामले में हाईटेक मतलब आधुनिक शहर के निर्माण के नाम पर भूमि अधिग्रहित की गई। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) ने उप्पल चढ्ड़ा व सन सिटी ग्रुप को इसका लाइसेंस दिया। यह 8,700 एकड़ क्षेत्र की भूमि किसानों व खुद सरकार की है। इस सरकारी भूमि को सामुदायिक भूमि या ग्राम सभा की भूमि भी कहते हैं। इस पर पंचायतों का अधिकार होता है। जीडीए के पूर्व सदस्य राजेंद्र त्यागी का आरोप है कि जीडीए ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी करते हुए इस परियोजना के लिए बिल्डरों को करीब 450 एकड़ सरकारी भूमि दी है। त्यागी ने आइएएनएस से कहा, इलाहबाद उच्च न्यायालय ने क्रॉसिंग रिपब्लिक के एक मामले में एक अक्टूबर 2007 को कहा था कि उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 117(6) के अनुसार सरकारी भूमि निजी कार्यो के लिए नहीं दी जा सकती। त्यागी कहते हैं, इसी मामले में अपने अंतिम आदेश में उच्च न्यायालय ने सरकारी भूमि को निजी बिल्डर को वापस दिए जाने की आयुक्त की अधिसूचना को खारिज कर दिया था। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने 28 जनवरी को अपने एक आदेश में कहा था कि गांव की सामुदायिक भूमि को निजी अथवा व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए देना गैरकानूनी है। अदालत ने राज्यों को अतिक्रमणकारियों से भूमि खाली कराने का निर्देश दिया था। त्यागी के मुताबिक गांव की सामुदायिक भूमि हाईटेक शहर के बिल्डरों को मात्र 1100 रुपये प्रति वर्ग मीटर में दी गई थी। इसके बाद इसे खरीददारों को 18,700 रुपये प्रति वर्ग मीटर में बेचा गया, जबकि एकीकृत बिल्डरों ने इसे 35,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से बेचा। त्यागी का कहना है कि जीडीए किसानों को एक हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से किसानों को मुआवजे की राशि दे रहा है। इतनी ही राशि किसानों को और दी गई है जिसका कोई आधिकारिक रिकार्ड नहीं रखा गया। उनका यह भी दावा कि है कि पांच गांवों काजीपुरा, डासना, बुयाना, नायल और बामहेता को इमरजेंसी क्लाज लगाकर भूमि अधिग्रहण कानून, 1894 की धारा-17 के तहत अधिग्रहीत किया गया। इमरजेंसी जैसी कोई वाजिब स्थिति नहीं होने के बावजूद किसानों को समय नहीं दिया और गांव का भी कोई विकास नहीं किया गया है। इस मुद्दे पर 19 विभिन्न याचिकाओं के साथ 774 किसान इलाहाबाद हाईकोर्ट में दस्तक दे चुके हैं।

-Dainik Jagran
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