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Apex court quashes UP land acquisition notification

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Apex court quashes UP land acquisition notification

Last updated: August 24 2011
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  • Apex court quashes UP land acquisition notification

    Aug 23: The Supreme Court has set aside the Uttar Pradesh government’s notifications for acquiring land in Ghaziabad for industry.

    The court said in the light of the facts of the case, the State was not justified in invoking the urgency provision under the Land Acquisition Act.
    The court acted on petitions filed by villagers against the State Government’s notifications in 2006 and 2007 to acquire the land for the ‘public purpose’ of the planned development of a City Project by invoking the Act's urgency provision.

    The State said that its 2006 notification for the urgent land acquisition was to comply with the apex court order in 2004 directing the relocation of the bone mills and other allied industries as they were causing environmental pollution and health hazards in Ghaziabad.

    But the villagers - citing the state Government’s delay of over two years in issuing the notifications - said that the urgency provision was unnecessarily invoked and it amounts to illegal deprivation of their right to file objection under Section 5-A of the Act.

    The apex court said such projects - which contemplate the development of residential, commercial, industrial or institutional areas - require a few years in their planning, execution and implementation. Therefore, the land acquisition for the said ‘public purpose’ does not justify the invoking of the Act’s urgency provisions, it said.

    Besides, the court said, acquisition of land for public purpose by itself shall not justify the exercise of power of eliminating enquiry under Section 5-A of the Act.

    Noting that the State had proceeded at very slow pace in issuing the notification, the court said, therefore, that it was not justified in invoking the Act’s urgency provisions, thereby, depriving the villagers of their right to raise objections against the land acquisition.

    The court said the State was “not justified in invoking the Act’s urgency provisions in an arbitrary manner by referring to our earlier directions as a defence for their illegal and arbitrary act of acquiring land without giving an opportunity of raising objections and hearing to the petitioners in terms of Section 5-A of the Act.”

    Business Line : Industry & Economy / Economy : Apex court quashes UP land acquisition notification
  • #2

    #2

    Re : Apex court quashes UP land acquisition notification

    गाजियाबाद का भूमि अधिग्रहण रद

    भूमि अधिग्रहण के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट से एक और झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हापुड़ में लेदर सिटी बनाने के लिए किया गया भूमि अधिग्रहण निरस्त कर दिया है। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी व न्यायमूर्ति एचएल दत्तू ने अधिग्रहण के खिलाफ दाखिल भू स्वामियों देवेन्दर त्यागी आदि की याचिका स्वीकार करते हुए 3 जुलाई 2006 व 18 दिसंबर 2007 की भू अधिग्रहण अधिसूचनाएं रद कर दी हैं। लेदर सिटी बनाने के लिए गाजियाबाद जिले की हापुड़ तहसील में राज्य सरकार ने रामपुर, इमटौरी, चितौली और सबली गांव की करीब 82 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की थी। राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण में आपात उपबंध का उपयोग किया था जिससे भू स्वामियों का आपत्ति उठाने का अधिकार समाप्त हो गया था। राज्य सरकार ने आपात उपबंध लागू करने के पीछे सुप्रीमकोर्ट के ही वर्ष 2004 के आदेश को आधार बनाया था, जिसमें कोर्ट ने राज्य सरकार से प्रदूषण समाप्त करने हेतु लेदर सिटी बसाने के लिए भूमि चिन्हित करने को कहा था। पीठ ने आपात उपबंध लागू करने के बारे में अपने पूर्व फैसलों में तय 8 दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ जनहित के आधार पर आपात उपबंध लागू कर लोगों का आपत्ति उठाने का अधिकार छीनना न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। इस मामले में कोर्ट ने राज्य सरकार से 2004 में भूमि चिन्हित करने को कहा था। जबकि राज्य सरकार ने दो साल बाद 3 जुलाई 2006 को धारा 4 की अधिग्रहण अधिसूचना निकाली और उसके 17 महीने बाद धारा 6 की अधिसूचना जारी की। इससे साफ होता है कि सरकारी तंत्र ने बहुत ही धीमी गति से काम किया। ऐसे में राज्य सरकार आपात उपबंध लागू करने को न्यायोचित नहीं ठहरा सकती। कोर्ट के आदेश पर अमल की दलील नकारते हुए कोर्ट ने कहा कि अदालत के आदेश या निर्देश का पालन कानून की जद में रह कर किया जाना चाहिए। राज्य सरकार को इसकी आड़ में तय कानूनी प्रक्रिया तोड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती। राज्य सरकार कोर्ट के आदेश की दलील देकर अपने गैरकानूनी, मनमाने भूमि अधिग्रहण को उचित नहीं ठहरा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने हापुड़ में लेदर सिटी बनाने के लिए नेशनल कैपिटल रीजन प्लानिंग बोर्ड (एनसीआरपीबी) की मंजूरी भी नहीं ली है। इसके अलावा धारा 6 के तहत जारी की गयी अधिग्रहण अधिसूचना तय समय सीमा के भीतर नहीं थी।

    -Dainik Jagran

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    • #3

      #3

      Re : Apex court quashes UP land acquisition notification

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      • #4

        #4

        Re : Apex court quashes UP land acquisition notification

        SC quashes land acquisition in Ghaziabad

        After quashing acquisition of land in Noida Extension,the Supreme Court on Tuesday set aside acquisition of 71 acres by UP government in Ghaziabad's Hapur area for setting up City to relocate all bone mills and allied industries there.

        Governments are having a tough time in the apex court defending acquisition of land under the Land Acquisition Act,1894,for they had mostly invoked the urgency clause without giving an opportunity to land owners to express their grievances.

        A bench of Justices G S Singhvi and H L Dattu quashed the July 3,2006,notification to acquire 28.804 hectares (71 acres) of land in Imotri,Chitoli and Sabli villages of Hapur-Pargana in Ghaziabad district for the public purpose of planned development of the City project by invoking urgency clause.

        Interestingly,the apex court in another case had directed the government to relocate the bone mills and allied industries as per the recommendations of the Central Pollution Control Board.It had also directed the government to identify the area suitable for relocation of these industries.Pursuant to this order,the UP government had proposed the City project.

        But the acquisition of land was challenged by farmers who said the invocation of urgency clause was bad in law as no development had taken place even after a year of the acquisition.

        Justice Dattu,writing the judgment for the bench,said the National Capital Region Planning Board (NCRPB),which was entrusted with the statutory duty of planned development of the entire area,had not given any clearance to the City project.

        "Therefore,in our opinion,the acquisition of land in the absence of express approval in terms of Section 19 of NCRPB Act and operation of Section 27 of the LA Act renders the entire acquisition proceedings illegal and hence vitiated,"it said.

        -TOI

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        • #5

          #5

          Re : Apex court quashes UP land acquisition notification

          BMW ki BMW ko courts puncture karne mein lage hain .
          Please read IREF rules | FAQ's

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          • #6

            #6

            Re : Apex court quashes UP land acquisition notification

            आखिर मिली किसानों को निर्णायक जीत


            लेदर सिटी के खिलाफ कई सालों से लड़ रहे क्षेत्र के दर्जनों गांवों के किसानों में इस मामले में निर्णायक जीत मिलने पर खुशी की लहर है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा एचपीडीए द्वारा किए गए भूमि अधिग्रहण को रद किए जाते ही प्रभावित गांवों के किसानों के चेहरे खिल गए हैं। किसानों ने इसे सत्य की जीत करार दिया है।

            कब शुरू हुई लड़ाई
            बुलंदशहर रोड पर वर्ष 1985 के आसपास हड्डी मिलों की शुरुआत हुई थी। वर्ष 1992-93 में क्षेत्र के गांव रामपुर, चितौली सहित लगभग एक दर्जन गांवों के लोगों ने इनसे निकलने वाली बदबू से आजिज होकर इसका विरोध शुरू किया। वर्ष 1998 में इन मिलों के खिलाफ किसानों की लड़ाई तेज हुई। इसी वर्ष मामला हाईकोर्ट पहुंचा। इसके बाद कोर्ट ने इन मिलों को बंद कर नगर पालिका क्षेत्र से पांच किलोमीटर दूर स्थापित करने के आदेश दिए। क्षेत्रीय अधिकारियों ने कोर्ट में शपथ पत्र जारी कर मिलों को बंद करा कर इन्हें काठीखेड़ा गांव की जमीन में विस्थापित करने की बात कही। कुछ दिन मिलों के बंद रहने के बाद इन्हें फिर चालू कर दिया गया। इसके बाद क्षेत्रीय स्तर पर किसानों का विरोध जारी रहा। वर्ष 2004 में हापुड़ पिलखुवा विकास प्राधिकरण (एचपीडीए) ने इस क्षेत्र को लेदर सिटी के रूप में विकसित करने की योजना बनाई। इसके लिए वर्ष 2005 में तत्कालीन प्रदेश सरकार के आदेशों पर प्राधिकरण द्वारा चार गांव रामपुर, सबली, चितौली व इम्टौरी गांवों के किसानों की भूमि का अधिग्रहण शुरू हुआ। अधिग्रहण के बाद जमीन को यूपीएसआइडीसी को सौंपा जाना था। किसानों को आठ सौ रुपये प्रति वर्गमीटर के हिसाब से मुआवजा दिया जाना तय हुआ। 2007 में किसान विरंजन त्यागी के नेतृत्व में किसान लेदर सिटी के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। किसानों का आरोप था कि यहां चल रही हड्डी मिलों को लेदर सिटी में शिफ्ट कर दिया जाएगा। प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहित भूमि वर्ष 2011 में यूपीएसआइडीसी को सौंप दिया गया।

            साठ प्रतिशत से अधिक किसान ले चुके हैं मुआवजा
            लेदर सिटी योजना के तहत 264 किसानों की कुल 258 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया जाना था। इसमें से 82.18 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है। साठ प्रतिशत के अधिक किसान मुआवजा राशि उठा चुके हैं। प्राधिकरण द्वारा अभी तक किसानों को 33 करोड़ राशि वितरित की जा चुकी है। किसान विरंजन त्यागी व जय प्रकाश त्यागी ने बताया कि किसानों ने अधिग्रहण का विरोध किया था। लेकिन प्राधिकरण धारा 17 के तहत कार्रवाई कर डाली। इसके बाद किसानों को मुआवजा उठाना पड़ा।

            क्या है स्थिति
            प्राधिकरण द्वारा लेदर सिटी के तीन में से दो चरणों की अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी कर प्राधिकरण ने भूमि को इसी वर्ष यूपीएसआइडीसी को सौंप दिया। कब्जे के बाद इस भूमि के कुछ हिस्सों की चारदीवारी आदि का कार्य किया जा चुका है।

            सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का इंतजार
            सुप्रीम कोर्ट द्वारा किसानों के हक में निर्णय दिए जाने पर प्रदेश सरकार को बड़ा झटका लगा है। एचपीडीए के सचिव वेद प्रकाश सिंह का कहना है कि अभी उन्हें मीडिया के माध्यम से ही इसकी जानकारी मिली है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जो भी आदेश दिए जाएंगे, उनके अनुपालन में आगे की कार्रवाई की जाएगी।

            फैसले से चमड़ा व्यापारियों में छायी मायूसी
            लेदर सिटी पर क्षेत्र ही नहीं मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर सहित कई जिलों के चमड़ा व्यापारियों की नजर थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद इनकी उम्मीदों पर भी पानी फिर गया है। इससे क्षेत्र सहित पांच सौ से अधिक चमड़ा व्यापारी प्रभावित होंगे। चमड़ा व्यापारी हाजी नफीस व यासीन ने बताया कि यहां नमक लगे चमड़े का कारोबार होता है। इसके बाद यह चमड़ा कानपुर की यूनिटों में जाता है। लेदर सिटी विकसित होने के बाद इस चमड़े को यहीं शोधित किया जाता है। कुल मिलाकर क्षेत्र में करोड़ों रुपये का कारोबार प्रभावित होगा। इससे क्षेत्र के दस हजार से भी अधिक बेरोजगारों को रोजगार मिलता। क्षेत्र भी प्रदूषण रहित रहता। इस फैसले का असर क्षेत्र के विकास पर भी पड़ेगा।

            -Dainik Jagran

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            • #7

              #7

              Re : Apex court quashes UP land acquisition notification

              फैसले से किसानों की खुशी का ठिकाना नहीं


              सुप्रीम कोर्ट द्वारा हापुड़ पिलखुवा विकास प्राधिकरण द्वारा क्षेत्र के चार गांवों रामपुर, सबली, चितौली व इम्टौरी में किए गए भूमि अधिग्रहण को रद किए जाने से इन गांवों के किसान काफी खुश हैं। किसानों के अनुसार उनकी भूमि में लेदर सिटी विकसित होने पर सभी गांव बुरी तरह प्रभावित होते।

              रामपुर के गांव प्रधान सुशील गुर्जर ने कहा कि हड्डी व सरेस मिलें इन क्षेत्रों के लिए अभिशाप बनी हुई हैं। गंदगी और बदबू के कारण लोग नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। लेदर सिटी पर रोक लगने से यहां के लोग चैन से जी सकेंगे।
              ग्रामीण राज सिंह ने कहा कि लेदर सिटी के रूप में सरकार क्षेत्र की हड्डी मिलों को लाइसेंस देने का काम कर रही थी। जो कार्य अभी तक चोरी छिपे होते थे उन्हें खुलकर किया जाना शुरू हो जाता। इसके अलावा जिन किसानों की जमीन चली जाती उनके पास आमदनी का कोई जरिया भी नहीं रह जाता। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्वागत योग्य है।

              ग्रामीण परमानंद त्यागी ने कहा कि इस क्षेत्र से प्रभावित गांवों में बुरे हालात हैं। गांवों में बदबू के कारण रिश्तेदार तक नहीं आते। इन गांवों के युवक-युवतियों की शादियों से लोग परहेज करने लगे हैं। ग्रामीण गांवों से पलायन को मजबूर हो गए हैं। अधिकतर लोग गाजियाबाद या हापुड़ जाकर रहने लगे हैं। इस स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ग्रामीणों के लिए वरदान है।

              ग्रामीण रमेश का कहना है कि हड्डी मिलों ने क्षेत्र के लोगों का जीवन नरक से भी बदतर बना दिया है। प्रभावित गांवों के लोग प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं। कोर्ट पहले भी इन मिलों को बंद कराकर विस्थापित कराने के आदेश दे चुका है लेकिन इसका अनुपालन नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से इस नरक के विस्तार से तो निजात मिल जाएगी लेकिन हड्डी मिलों से पूरी तरह से छुटकारे के लिए अभी और संघर्ष करना पड़ेगा।



              -Dainik Jagran

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