पतवाड़ी के किसानों का लिखित समझौता
जागरण संवाददाता, ग्रेटर नोएडा किसानों के साथ समझौते की दिशा में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को बृहस्पतिवार को बड़ी सफलता हासिल हुई। पतवाड़ी गांव के किसानों के साथ प्राधिकरण का समझौता हो गया। इससे बिल्डरों व निवेशकों को बहुत बड़ी राहत मिली है। समझौता भी किसानों के लिए फायदेमंद रहा। उन्हें अब 550 रुपये प्रति वर्गमीटर अतिरिक्त मुआवजा देने पर सहमति बन गई है। साथ ही आबादी व बैकलीज की शर्तो को हटा लिया गया है। हालांकि नोएडा के सेक्टर-62 में गुरुवार को देर रात तक अन्य मुद्दों पर प्राधिकरण व किसानों के बीच बातचीत जारी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 19 जुलाई को पतवाड़ी गांव की 589 हेक्टयेर जमीन का अधिग्रहण रद कर दिया था। अधिग्रहण रद होने से सात बिल्डरों के प्रोजेक्ट प्रभावित हुई हुए थे। 26 हजार निवेशकों के फ्लैट का सपना भी टूट गया था। प्राधिकरण के ढाई हजार भूखंड़ों, चार सौ निर्मित मकानों व दो इंजीनियरिंग कॉलेज की योजना भी अधर में लटक गई थी। 26 जुलाई को हाईकोर्ट ने नोएडा एक्सटेंशन के अन्य गांवों की सुनवाई के दौरान प्राधिकरण, बिल्डर व किसानों को 12 अगस्त तक आपस में समझौते करने का सुझाव दिया था। हाईकोर्ट के सुझाव पर प्राधिकरण ने किसानों से समझौते के लिए वार्ता की पहल शुरू की। 27 जुलाई को प्राधिकरण के सीईओ रमा रमन ने सबसे पहले पतवाड़ी गांव के प्रधान को पत्र भेज कर वार्ता करने के लिए आमंत्रित किया। दूसरे दिन ग्राम प्रधान रेशपाल यादव ने प्राधिकरण कार्यालय पहुंच कर सीईओ से बातचीत कर उनका रुख जानने का प्रयास किया था। 30 जुलाई को सीईओ ने गांव पतवाड़ी जाकर किसानों से सामूहिक रूप में बात की। इस दौरान मुआवजा वृद्धि को छोड़कर किसानों के साथ अन्य मांगों पर प्राधिकरण ने सकारात्मक रुख दिखाया। मुआवजा बढ़ोतरी पर बातचीत करने के लिए किसानों को आपस में कमेटी गठित कर वार्ता का प्रस्ताव सीईओ दे आए थे। इसके बाद किसानों के साथ गुरुवार को नोएडा के सेक्टर-62 में बैठक बुलाई गई। इसमें प्राधिकरण के सीईओ रमा रमन, ग्रामीण अभियंत्रण मंत्री जयवीर ठाकुर, सांसद सुरेंद्र सिंह नागर व जिलाधिकारी के साथ किसानों की वार्ता शुरू हुई। आठ घंटे तक वार्ता चलने के बाद किसान समझौते के लिए तैयार हो गए। सूत्रों के अनुसार पतवाड़ी गांव के किसानों को मिले 850 रुपये प्रति वर्गमीटर के अलावा 550 रुपये प्रति वर्गमीटर और देने पर सहमति बन गई है। देर रात तक बैठक जारी थी। अभी इसकी अधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। हालांकि गांव के कुछ किसानों ने वार्ता की पुष्टि की है। इससे पूर्व किसानों की आबादी को पूरी तरह से अधिग्रहण मुक्त रखा जाएगा। बैकलीज की शर्ते हटा ली जाएगी। पतवाड़ी गांव का समझौता होने पर प्राधिकरण को नोएडा एक्सटेंशन के अन्य गांवों में किसानों के साथ समझौता करने की राह आसान हो गई है। नोएडा एक्सटेंशन विवाद ने रोके खरीददार : नोएडा एक्सटेंशन विवाद ने समूचे ग्रेटर नोएडा एवं यमुना एक्सप्रेस वे प्राधिकरण क्षेत्र में संपत्तियों की खरीद-फरोख्त पर ब्रेक लगा दिया है। दोनों जगह ढूंढे से भी खरीददार नहीं मिल रहे हैं। कुछ समय पहले तक जो लोग शहर में अपना आशियाना बनाने के लिए आतुर थे, वे अब यहां संपत्ति खरीदने से हिचकिचा रहे हंै। पिछले बीस दिनों में भूखंड व मकानों की गिनी-चुनी रजिस्ट्री हुई हैं। सिर्फ गांवों में कृषि व आबादी भूमि की रजिस्ट्री हो रही है। इससे प्रदेश सरकार को राजस्व की भी हानि उठानी पड़ रही है
-Dainik Jagran.
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  • Now you speak like a true home buyer,if people think like you and raise there voice . No gov/ authority is bigger than common man.

    The issue looks to be solved with in no time,only problem is we have come out of our comfort zone.;)
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  • Originally Posted by fritolay_ps
    This shows that rest of guys are INVESTORS and not BUYERS so they do not have much interest.


    Fritobhai, do you mean to say that only 100-200 persons who joined dharna are buyers
    and rest r investors?

    Believe me these associations are loosing faith in buyers's mind.
    Admins of these groups are running their business of property dealing.
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  • Originally Posted by cookie
    I was very much optimistic and its me who used to say that NE issue would be resolved by Dec2011....but see where we stand now, not even a single step we have moved ahead... Thereafter and therefore I gave up hope.........

    I am going to this time to NCRPB office to protest

    Ye hui na bat.bhai come with your friends and we do some "HALLA BOL" type.
    uske bad idhar udhar ghoom lege and can enjoy our Sunday, so no issue only two hours.

    please all the buyers,real man and lover of real estate come together at said place.

    No one knows anything can be happened with any area/projects(750 flats demolish in ......)at any time.

    because This is politics.Agar abhi nahi to es sal nhi aur es sal nhi to fir 2015.

    HALLA BOL:bab (68)::bab (68)::bab (68):
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  • Really....I am loosing my patience now. What the hell NCRPB has to do for the approval that 1 lac investors are left crying since last one year !!!!
    I think Its time now we all investors will have to think and hold a big protest before NCRPB office. Thats only thing we can do and we should do.
    I request NEFOMA/NEOMA to hold the protest before NCRPB office on coming sunday and I also request NE buyer to com out of their ACs for a single day and join the protest. Big Numbers can change the game....
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  • Originally Posted by nagendra007
    Really....I am loosing my patience now. What the hell NCRPB has to do for the approval that 1 lac investors are left crying since last one year !!!!
    I think Its time now we all investors will have to think and hold a big protest before NCRPB office. Thats only thing we can do and we should do.
    I request NEFOMA/NEOMA to hold the protest before NCRPB office on coming sunday and I also request NE buyer to com out of their ACs for a single day and join the protest. Big Numbers can change the game....


    Nefoma and neoma kabhi ek saath nahi aayege. Their admins have their own interest
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  • NE investors will soon win their war with court and government, but I am afraid that an another war with their builder will start. Builders are not accustomed of taking any kind of loss. In fact, a profit margin of less than 40% is also treated as loss by builders.

    Builders will demand their pound of flesh before they start construction.
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  • Originally Posted by McLordGanj
    NE investors will soon win their war with court and government, but I am afraid that an another war with their builder will start. Builders are not accustomed of taking any kind of loss. In fact, a profit margin of less than 40% is also treated as loss by builders.

    Builders will demand their pound of flesh before they start construction.


    That's the third major concern after authority approval and SC verdict.

    Builders tricks start only after the matter solved completely.

    First issue is work resume,early possible
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  • The most sufferer in this whole mess is "the buyer" who has already invested. They are left with no alternative.
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  • yes the bechara ,hopeless ,poor ,lazy buyer .like u and me.
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  • Homebuyers to stage dharna on June 8

    NOIDA: The promise given to Noida Extension homebuyers about clearance to the Greater Noida Master Plan 2021 on May 29 turned out to be another damp squib. Buyers have now decided that they will stage a dharna in front of the planning board on June 8 to pressure them into clearing the plan.

    Since the October 21 verdict of the Allahabad high court, buyers have been promised time and again that construction work would resume once the planning board approves the Master Plan. This month itself, three dates had been promised to them - May 15, 22 and 29.

    Meanwhile, sources in Greater Noida Authority say that construction will have to wait till legal cases are cleared. "Construction cannot begin even on projects on the land of Patwari village, despite majority of the farmers having accepted the compensation formula. The Authority has to wait for a decision on the SLP it has filed in the Supreme Court against the Allahabad HC order," said a Greater Noida Authority official.

    Besides, farmers have also filed several appeals in the Supreme Court seeking denotification of land, apart from the pending writ petitions in the Allahabad HC. "Land belonging to farmers who have rejected the compensation formula is part of the plots allotted to developers and construction cannot be done around them," said farmers' lawyer Parmindera Bhati.




    Homebuyers to stage dharna on June 8 - The Times of India
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  • लटका किसानों की आबादी निस्तारण का मामला


    ग्रेटर नोएडा, : आबादी निस्तारण के लिए किसानों को अब जुलाई तक इंतजार करना होगा। स्थानीय निकाय चुनाव की घोषणा होने के साथ आचार संहिता लागू हो गई है। आचार संहिता के चलते प्राधिकरण ने आबादी निस्तारण पर रोक लगा दिया है। हर सप्ताह मंगलवार को प्राधिकरण में होने वाले किसान दिवस को भी जुलाई तक टाल दिया गया है।

    आबादी निस्तारण की मांग किसान लंबे अर्से से करते चले आ रहे हैं। नवंबर 2011 में विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के बाद प्राधिकरण ने आबादी निस्तारण पर रोक लगा दी थी। मार्च में आचार संहिता खत्म होने के बाद भी किसानों के आबादी निस्तारण का काम नहीं शुरू हो पाया। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन होने पर प्राधिकरण अधिकारियों ने तबादले की आशंका के चलते आबादी निस्तारण नहीं कर पा रहे थे। कुछ अधिकारियों का निस्तारण होने के बाद उनके स्थान पर नए अधिकारियों की तैनाती होने पर आबादी निस्तारण की प्रक्रिया प्राधिकरण ने शुरू किया। गांवों में आबादी का सर्वे करने के लिए टीम गठित की गई। टीम ने दो गांवों में जाकर आबादी का सर्वे किया। इसी दौरान स्थानीय निकाय चुनाव की घोषणा होने पर प्रदेश में आचार संहिता लागू हो गई। प्राधिकरण ने आबादी के सर्वे का काम रोक दिया। निकाय चुनाव जुलाई तक चलेगा। अब जुलाई के बाद ही प्राधिकरण किसानों के आबादी का निस्तारण कर पाएगा। हालांकि, किसानों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि प्राधिकरण ने जानबूझ कर आबादी निस्तारण को लटका रखा है। आबादी को लेकर अधिकारियों की मंशा साफ नहीं है। किसानों कहना है कि अधिकारियों की मंशा साफ होती तो अप्रैल से आबादी का निस्तारण शुरू कर देते। जिन गांवों में आबादी का निस्तारण हो चुका है, उसे बोर्ड से मंजूर नहीं कराया है।

    बोर्ड बैठक जुलाई तक टला
    ग्रेटर नोएडा व यमुना एक्सप्रेस-वे प्राधिकरण की बोर्ड बैठक भी जुलाई तक टल सकती है। आचार संहिता लागू होने के कारण प्राधिकरण इस दौरान नीतिगत फैसले नहीं ले सकता है। बोर्ड बैठक नहीं होने की सूरत में दोनों प्राधिकरण का बजट भी अब जुलाई में पास होने की उम्मीद है। प्राधिकरण के अधिकारिक सूत्रों का कहना है कि बोर्ड बैठक नहीं होने से कई महत्वपूर्ण विकास भी शुरू नहीं हो पाएंगे। आगामी वित्तीय वर्ष का बजट पास होने के बाद ही विकास कार्य शुरू हो सकते है। अगर बोर्ड बैठक करना जरूरी है तो इसके लिए प्राधिकरण को निर्वाचन आयोग से अनुमति लेनी पड़ेगी।




    -dainik jagran
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  • ग्रेनो के किसान पहुंचे एनसीआर प्लानिंग बोर्ड

    ग्रेटर नोएडा शहर का मास्टर प्लान-2021 मंजूर नहीं करने की मांग को लेकर नोएडा एक्सटेंशन के किसान मंगलवार को एनसीआर प्लानिंग बोर्ड के कार्यालय पहुंच गए। अधिकारियों को ज्ञापन देकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक मास्टर प्लान मंजूर न करने की मांग रखी। एक्सटेंशन के किसानों की राय लेने के लिए किसानों ने गांवों में हस्ताक्षर अभियान चलाया। संयुक्त युवा किसान संघर्ष समिति के बैनर तले किसान दिल्ली एनसीआर प्लानिंग बोर्ड के कार्यालय पहुंचे। अधिकारियों को ज्ञापन सौंप कर कहा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट का निर्णय न आ जाए, मास्टर प्लान को मंजूरी न दी जाए। उसके बाद भी मास्टर प्लान की मंजूरी बिल्डरों के लिए न देकर उद्योग लगाने के लिए दी जाए। मास्टर प्लान मंजूरी के लिए होने वाली बोर्ड बैठक में भी किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल को शामिल करने की मांग की जिससे वे भी अपना पक्ष रख सकें। किसानों ने कहा कि प्राधिकरण द्वारा गलत तरीके से भूमि अधिग्रहण करने पर वे बेरोजगार हो चुके हैं। उन्होंने आग्रह किया कि बोर्ड मास्टर प्लान को मंजूरी देने से पहले किसानों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए रोजगार एवं शिक्षा की व्यवस्था मास्टर प्लान में मंजूर कराए।

    dainik jagran
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  • निवेशकों का हल्ला बोल 8 को

    एनसीआर प्लानिंग बोर्ड से मास्टर प्लान मंजूर होने में हो रही देरी पर एक्सटेंशन के निवेशकों का सब्र का बांध टूटता जा रहा है। निवेशकों ने आठ जून को दिल्ली एनसीआर प्लानिंग बोर्ड के कार्यालय पर हल्ला बोल करने का निर्णय लिया है। नोएडा एक्सटेंशन फ्लैट ऑनर एंड मेंबर एसोसिएशन (नेफोमा) ने मंगलवार को बैठक कर यह निर्णय लिया। नेफोमा की महासचिव श्वेता भारती ने बताया कि एक लाख निवेशक लंबे अर्से से मास्टर प्लान मंजूर होने का इंतजार कर रहे हैं। इस दौरान शांतिपूर्ण ढंग से धरना-प्रदर्शन व रैली का आयोजन किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, केंद्रीय शहरी विकास मंत्री कमलनाथ से मिलकर अपनी मांग रख चुके हैं। प्राधिकरण की तरफ से मास्टर प्लान मंजूर होने की कोई तिथि निर्धारित नहीं की जा रही है। इससे निवेशकों की चिंता बढ़ती जा रही है।

    Dainik Jagran
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  • भू-अधिग्रहण विधेयक पर उठते कुछ सवाल

    विकास के लिए उद्योग और उद्योग के लिए जमीन की जरूरत स्वाभाविक है, लेकिन भारत में इसके लिए अब तक किसी व्यापक व स्थायी नीति का निर्माण नहीं किया जा सका है। भूमि अधिग्रहण एक जटिल समस्या है जिससे देश के विभिन्न हिस्सों में विवाद खड़े हो रहे हैं। इस दिशा में पिछले वर्ष सकारात्मक कदम उठाते हुए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास विधेयक-2011 तैयार किया। इसमें पुराने कानूनों की कमियों को भी दूर करने का प्रयास किया गया है। इस संबंध में सुमित्रा महाजन की अध्यक्षता वाली संसदीय स्थायी समिति ने विधेयक की खामियों को संसद में रखते हुए बताया कि खेती योग्य भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि कई विकसित देशों जैसे ब्रिटेन, अमेरिका, जापान, कनाडा आदि में निजी क्षेत्र के लिए जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाता। समिति की दूसरी सिफारिश है कि विधेयक में अधिग्रहण के उद्देश्य में लोक प्रयोजन की अवधारणा स्पष्ट नहीं है। समिति ने निजी-सार्वजनिक भागीदारी वाली परियोजनाओं हेतु भूमि अधिग्रहण को सही नहीं माना है। लोक प्रयोजनों के लिए जमीन के अधिग्रहण के पूर्व ग्राम सभाओं की सहमति लेनी होगी और अधिग्रहित भूमि का वास्तविक कीमत निर्धारण करने के लिए एक बहुसदस्यीय आयोग बनाने की भी समिति ने सिफारिश की है। भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास विधेयक के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा, पुलिस, लोक सुरक्षा सहित रेलवे, राजमार्ग, बंदरगाह, बिजली, सिंचाई इत्यादि के लिए भूमि अधिग्रहित किए जा सकते हैं। इसी तरह निजी या निजी-सार्वजनिक भागीदारी की परियोजनाओं के लिए भूमि का अधिग्रहण नहीं किए जाने से देश का आर्थिक विकास निश्चित रूप से अवरुद्ध होगा। यह प्रमाणित हो चुका है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी के बिना स्थापित होने वाले उद्योग आर्थिक दृष्टि से बेहतर योगदान दे पाने में शायद ही सक्षम हो सकें।

    वर्तमान नीतियों में मौजूद खामियों को दूसरी तरह से भी दूर किया जा सकता है, लेकिन इसका यह उपाय नहीं है कि इसके लिए जमीन का अधिग्रहण ही न किया जाए। स्थायी समिति की यह बात बिल्कुल ठीक है कि किसी भू-क्षेत्र के अधिग्रहण के पूर्व ग्राम सभा की सहमति ली जानी चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि प्राय: देखा जाता है कि सरकार अधिग्रहण तो कर लेती है परंतु बाद में आम लोग विरोध करने लगते हैं जिस वजह से परियोजनाएं पिछड़ने लगती हैं। पिछले कुछ दशको में आम लोगों के बीच भूमि अधिग्रहण नीतियों व गतिविधियों को लेकर खासा अविश्वास और विरोध रहा है। हम पश्चिम बंगाल में सिंगुर, तमिलनाडु में कुडनकुलम, उत्तर प्रदेश में भट्टा परसौल, महाराष्ट्र में जैतापुर, ओडिशा, बिहार आदि राज्यों में इस तरह विरोध देख चुके हैं। अब तक के भूमि अधिग्रहण के अनुभव हमारे लिए सकारात्मक नहीं रहे हैं। देश के विभिन्न भागों में किसानों की आत्महत्या का सीधा संबंध इस तरह के अधिग्रहण में देखे जा सकते हैं। प्राय: भू स्वामी और अधिग्रहणकर्ता के बीच अविश्वास व विरोध की भावना दिखती है जिसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं-पहला जमीन के स्वामी का जमीन से गहरा भावनात्मक लगाव का होना और दूसरा जमीन अधिग्रहण के बाद निर्माण कार्य शुरू होने पर जमीन की कीमतें बढ़ना। ऐसी स्थिति में संबंधित किसान जिसकी जमीन अधिग्रहित हो चुकी होती है बढे़ कीमत से अपनी जमीन की तुलना करके खुद को ठगा महसूस करता है। हालांकि वर्तमान विधेयक में इस समस्या से निपटने के लिए कुछ उपाय किए गए हैं। इन उपायों में पहला यह है कि सरकार अपने इस्तेमाल के लिए ही भूमि का अधिग्रहण करे और उस पर अपना ही नियंत्रण रखे। दूसरे सरकार इस उद्देश्य के लिए भूमि का अधिग्रहण करे कि उसे सार्वजनिक कामों के लिए ही निजी कंपनियों को स्थांतरित किया जाए। इसके अंतर्गत निजी-सार्वजनिक भागीदारी की परियोजनाएं शामिल नहीं होनी चाहिए। तीसरा सरकार यह घोषित सार्वजनिक उद्देश्य को बाद में किसी भी हाल में न बदलने की नीति सुनिश्चित करे। इन उपायों से किसानों की पहली समस्या का निवारण कर दिया गया है और साथ ही अधिग्रहण के बाद जमीन की कीमत बढ़ने की स्थिति को देखते हुए यह भी समायोजित करने की कोशिश की गई है कि किसानों को अधिक राशि और सहयोग मिल सके।

    इसमें यह उपाय शामिल है कि यदि परियोजना रोजगार सृजन वाली है तो प्रभावित होने वाले परिवार के कम से कम एक व्यक्ति को रोजगार अथवा 5 लाख रुपये दिए जाएंगे। यदि परियोजना के दायरे में किसी का मकान आता है तो उसे इंदिरा आवास योजना के तहत एक मकान बनाकर दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त 12 माह तक प्रति परिवार प्रति माह 3000 रुपये गुजारा भत्ता तथा 2000 रुपये प्रति छह माह में अतिरिक्त दिए जाएंगे। इसके साथ ही अधिग्रहित भूमि के लिए 50 हजार रुपये पुनर्वास भत्ता तथा 50 हजार रुपये परिवहन भत्ता भी दिए जाने का प्रावधान है। इसमें अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए कुछ विशेष व्यवस्थाएं भी की गई हैं। संसद की स्थायी समिति ने विधेयक की इस बात के लिए आलोचना की है कि विधेयक पूर्ववर्ती कमियों को पूरी तरह दूर करने का उपाय नहीं सुझाता है। 1894 में बने भूमि अधिग्रहण कानून जिसे 1962 और 1994 में संशोधित किया गया था ज्यादा उपयोगी नहीं साबित हुआ। इन कानूनों के तहत राज्य ने निजी क्षेत्रों के लिए जो भूमि अधिग्रहण किए उनका दुष्परिणाम हमें आदिवासियों तथा पिछड़े वर्गो का नक्सल गतिविधियों में संलिप्तता बढ़ने के रूप में देखने को मिला। आदिवासियों के लिए जंगल और जमीन का महत्व प्राचीन समय से है और ऐसे में उनका वहां से विस्थापित होना कई तरह के संकटों को बढ़ाने वाला है। इस संदर्भ में यदि हम वर्तमान विधेयक की प्रकृति पर ध्यान दें तो इस समस्या का हल खोजा जा सकता है। भारत के इतिहास में यह पहला विधेयक है जिसमें अधिग्रहण के बाद प्रभावित और विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के बारे में विस्तृत प्रावधान किए गए हैं। विधेयक में साफ कहा गया है कि जहां भी पुनर्वास किया जाएगा वहां 25 बुनियादी सुविधाएं दी जाएंगी। यहां स्कूल, खेल के मैदान, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, शुद्ध पेयजल, आंगनवाडी केंद्र, डाकघर, सस्ते राशन की दुकान आदि की सुविधाएं सुनिश्चित की जाएंगी। वर्तमान अधिनियम इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर है कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आसान, अधिक पारदर्शी एवं निष्पक्ष हो। इसके जरिये एक नया संस्थागत तंत्र उपलब्ध कराने का भी प्रावधान है जो इस बात को सुनिश्चित करेगा कि पुनर्वास व पुनस्र्थापन की प्रक्रिया कारगर ढंग से लागू हो सके। इसमें आदिवासी क्षेत्रों के भूमि अधिग्रहण के मुद्दे को भी ध्यान में रखा गया है। इसी तरह उद्योग के लिए जमीन पर सुझाव है कि एक वर्ष में दो या अधिक फसल देने वाली जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाए। परंतु परियोजना क्षेत्र में यदि कुछ ऐसी जमीन आ भी जाती है तो क्या पूरी परियोजना को त्यागना उचित होगा? ऐसे तमाम सवाल हैं जिनका समाधान भूमि अधिग्रहण कानून को अधिक प्रासंगिक बनाने के लिए जरूरी हैं। इसके लिए सरकार को इस नीति को समन्वित बनाना होगा ताकि सभी को लाभ मिलने के साथ ही उठने वाले किसी भी संभावित विवाद को टाला जा सके और देश के विकास से जुड़े इस अहम मुद्दे पर सर्वसहमति बनाई जा सके।

    dainik jagran
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  • लोकपाल के रास्ते पर भूमि कानून

    पिछले साल जब भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास व पुनस्र्थापन विधेयक-2011 के लिए पहल की गई तो उम्मीद बंधी कि भूमि अधिग्रहण के संदर्भ में अंगे्रजों द्वारा बनाए गए कानूनों से छुटकारा मिल जाएगा और ऐसे नियम सामने आ सकेंगे जिनके तहत किसानों के अधिकार सुरक्षित होंगे। परंतु अब इस विधेयक में ग्रामीण विकास मंत्रालय की पहल पर संसदीय समिति ने जो संशोधन प्रस्तावित किए हैं उनसे इस विधेयक का मूल उद्देश्य ही खत्म होता नजर आ रहा है। अब लगता है कि यह विधेयक भी लोकपाल विधेयक के रास्ते पर जा रहा है। प्रस्तावित विधेयक का मूल उद्देश्य भूमि अधिग्रहण नियमों को सरल बनाना और किसानों के अधिकारों को सुरक्षित रखना था, लेकिन संसदीय समिति का सुझाव है कि विधेयक के प्रावधानों की फिर से समीक्षा की जाए और जनहित में किए जाने वाले अधिग्रहणों में सरकार की भूमिका न्यूनतम हो, फिर वह चाहे निजी कंपनियों से जुड़ा मसला हो अथवा निजी और सार्वजनिक भागीदारी वाली कंपनियों के लिए अधिग्रहण का मुद्दा हो। इसके अलावा समिति का प्रस्ताव है कि अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण पर प्रतिबंध लगाया जाए। अनुसूचित क्षेत्र 12 से अधिक राज्यों में फैला हुआ है जिस पर 830 लाख लोग रहते हैं। इनमें से अधिकतर आदिवासी हैं। प्रस्तावित संशोधनों में अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाला एक अनुमान यह है कि निजी कंपनियां कभी भी कोई चीज जनहित में नहीं कर सकतीं। सच्चाई यह है कि देश के युवाओं को अधिक रोजगार अवसरों की आवश्यकता है। समिति के सुझावों में खाद्य सुरक्षा की जरूरतों को पूरा करने के लिए न केवल बहुफसलीय कृषि भूमि, बल्कि सभी प्रकार की कृषि भूमि के अधिग्रहण पर प्रतिबंध की बात है। जाहिर है ऐसे तुगलकी प्रावधानों से इस जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि व्यावसायिक योजनाओं, बुनियादी ढांचे के विकास और शहरीकरण के लिए भूमि की आवश्यकता होती है। हमारे देश में समस्या यह है कि भूमि रिकॉर्ड सही से रखा नहीं गया है, मालिकाना हक अक्सर विवादित होता है, क्योंकि एक पट्टे के कई दावेदार निकल आते हैं जिससे बड़ी संख्या में दीवानी के मुकदमे चलते रहते हैं। इस वजह से निजी कंपनियां जमीन नहीं खरीद पातीं। अक्सर यह भी देखने में आता है कि राज्य सरकारें बाजार भाव से बहुत कम पर किसानों की जमीन कब्जा लेती हैं ताकि निजी कंपनियों को सस्ते में इन्हें उपलब्ध कराया जा सके। इससे कई तरह के नुकसान होते हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि किसानों को अपनी भूमि का सही मुआवजा नहीं मिल पाता। दूसरा यह कि किसान बेघर हो जाते हैं, क्योंकि उनके पुनर्वास व पुनस्र्थापना की जिम्मेदारी किसी की नहीं होती। फिर यह भी महत्वपूर्ण है कि निजी कंपनियंा राज्य सरकारों के जरिए जो भूमि कब्जाती हैं वह अक्सर जनहित में कोई कार्य नहीं करतीं और निर्धारित शर्तो का पालन तक नहीं करतीं। यही कारण है कि किसान भूमि अधिग्रहण के विरोध में प्रदर्शन करने पर मजबूर होते हैं। यह प्रदर्शन अक्सर हिंसक भी हो जाते हैं। दरअसल इस किस्म की समस्याओं को देखते हुए ही पिछले साल यह विधेयक तैयार किया गया था। इसमें प्रावधान रखे गए कि उपजाऊ कृषि भूमि को अधिग्रहीत नहीं किया जाएगा, निजी कंपनियों के लिए सरकार भूमि अधिग्रहण नहीं करेगी, जनहित के लिए अधिग्रहीत की गई भूमि का मुआवजा बाजार भाव के अनुसार दिया जाएगा और जिन लोगों की भूमि ली जाएगी उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जाएगी। जाहिर है यह प्रावधान न राज्य सरकारों को पसंद थे और न ही पूंजीपतियों को। इसलिए मूल विधेयक का विरोध होने लगा। केंद्र सरकार ने ऐसी स्थिति में अपनी आदत के अनुसार विधेयक को ग्रामीण विकास से संबंधित संसदीय तदर्थ समिति के पास भेज दिया। समिति के समक्ष अनेक राज्यों ने आपत्तियां दर्ज कीं। मध्य प्रदेश सरकार का आरोप है कि विधेयक संघीय सिद्धांत पर हमला है, क्योंकि इसमें भूमि की बिक्री व खरीद के बाद पुनर्वास व पुनस्र्थापना का प्रावधान है। हिमाचल प्रदेश व महाराष्ट्र ने भी संघवाद के मुद्दे उठाए। इन आपत्तियों के मद्देनजर केंद्र सरकार ने फैसला किया है कि राज्य सरकारों ने आदिवासियों और ग्राम सभाओं के हितों को सुरक्षित रखने के लिए जो सुझाव दिए हैं उन्हें विधेयक में शामिल किया जाएगा। नया विधेयक संसद के मानसून सत्र से पहले तैयार कर लिया जाएगा, जिसमें संघीय ढांचे को सुरक्षित रखने का प्रयास होगा क्योंकि विकास उद्देश्यों के चलते भूमि अधिग्रहण से बचा नहीं जा सकता।

    dainik jagran
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