पतवाड़ी के किसानों का लिखित समझौता
जागरण संवाददाता, ग्रेटर नोएडा किसानों के साथ समझौते की दिशा में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को बृहस्पतिवार को बड़ी सफलता हासिल हुई। पतवाड़ी गांव के किसानों के साथ प्राधिकरण का समझौता हो गया। इससे बिल्डरों व निवेशकों को बहुत बड़ी राहत मिली है। समझौता भी किसानों के लिए फायदेमंद रहा। उन्हें अब 550 रुपये प्रति वर्गमीटर अतिरिक्त मुआवजा देने पर सहमति बन गई है। साथ ही आबादी व बैकलीज की शर्तो को हटा लिया गया है। हालांकि नोएडा के सेक्टर-62 में गुरुवार को देर रात तक अन्य मुद्दों पर प्राधिकरण व किसानों के बीच बातचीत जारी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 19 जुलाई को पतवाड़ी गांव की 589 हेक्टयेर जमीन का अधिग्रहण रद कर दिया था। अधिग्रहण रद होने से सात बिल्डरों के प्रोजेक्ट प्रभावित हुई हुए थे। 26 हजार निवेशकों के फ्लैट का सपना भी टूट गया था। प्राधिकरण के ढाई हजार भूखंड़ों, चार सौ निर्मित मकानों व दो इंजीनियरिंग कॉलेज की योजना भी अधर में लटक गई थी। 26 जुलाई को हाईकोर्ट ने नोएडा एक्सटेंशन के अन्य गांवों की सुनवाई के दौरान प्राधिकरण, बिल्डर व किसानों को 12 अगस्त तक आपस में समझौते करने का सुझाव दिया था। हाईकोर्ट के सुझाव पर प्राधिकरण ने किसानों से समझौते के लिए वार्ता की पहल शुरू की। 27 जुलाई को प्राधिकरण के सीईओ रमा रमन ने सबसे पहले पतवाड़ी गांव के प्रधान को पत्र भेज कर वार्ता करने के लिए आमंत्रित किया। दूसरे दिन ग्राम प्रधान रेशपाल यादव ने प्राधिकरण कार्यालय पहुंच कर सीईओ से बातचीत कर उनका रुख जानने का प्रयास किया था। 30 जुलाई को सीईओ ने गांव पतवाड़ी जाकर किसानों से सामूहिक रूप में बात की। इस दौरान मुआवजा वृद्धि को छोड़कर किसानों के साथ अन्य मांगों पर प्राधिकरण ने सकारात्मक रुख दिखाया। मुआवजा बढ़ोतरी पर बातचीत करने के लिए किसानों को आपस में कमेटी गठित कर वार्ता का प्रस्ताव सीईओ दे आए थे। इसके बाद किसानों के साथ गुरुवार को नोएडा के सेक्टर-62 में बैठक बुलाई गई। इसमें प्राधिकरण के सीईओ रमा रमन, ग्रामीण अभियंत्रण मंत्री जयवीर ठाकुर, सांसद सुरेंद्र सिंह नागर व जिलाधिकारी के साथ किसानों की वार्ता शुरू हुई। आठ घंटे तक वार्ता चलने के बाद किसान समझौते के लिए तैयार हो गए। सूत्रों के अनुसार पतवाड़ी गांव के किसानों को मिले 850 रुपये प्रति वर्गमीटर के अलावा 550 रुपये प्रति वर्गमीटर और देने पर सहमति बन गई है। देर रात तक बैठक जारी थी। अभी इसकी अधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। हालांकि गांव के कुछ किसानों ने वार्ता की पुष्टि की है। इससे पूर्व किसानों की आबादी को पूरी तरह से अधिग्रहण मुक्त रखा जाएगा। बैकलीज की शर्ते हटा ली जाएगी। पतवाड़ी गांव का समझौता होने पर प्राधिकरण को नोएडा एक्सटेंशन के अन्य गांवों में किसानों के साथ समझौता करने की राह आसान हो गई है। नोएडा एक्सटेंशन विवाद ने रोके खरीददार : नोएडा एक्सटेंशन विवाद ने समूचे ग्रेटर नोएडा एवं यमुना एक्सप्रेस वे प्राधिकरण क्षेत्र में संपत्तियों की खरीद-फरोख्त पर ब्रेक लगा दिया है। दोनों जगह ढूंढे से भी खरीददार नहीं मिल रहे हैं। कुछ समय पहले तक जो लोग शहर में अपना आशियाना बनाने के लिए आतुर थे, वे अब यहां संपत्ति खरीदने से हिचकिचा रहे हंै। पिछले बीस दिनों में भूखंड व मकानों की गिनी-चुनी रजिस्ट्री हुई हैं। सिर्फ गांवों में कृषि व आबादी भूमि की रजिस्ट्री हो रही है। इससे प्रदेश सरकार को राजस्व की भी हानि उठानी पड़ रही है
-Dainik Jagran.
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  • Originally Posted by lalitonhp
    Yeh to complete ho Gaya ....... Ab to bus possession baki hai.....




    Bhai possession kab mil raha hai?
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  • Originally Posted by Sunder_Lal
    hmm .. shayad sari labour metro se utar ke shared auto karke kaam pe aati hogi.Ab construction hoga to transportation ka intejaam bhi hoga .. Auto to shuru kara diye hain Amrapali aur SuperChor ne .. 5 saal me metro bhi aa jayegi. :)

    Fir labour ko badi aasani rahegi .. direct Gaur ke gol chakkar pe utrenge .. :)


    are sunder lal ji apne bhi DP mai liya hua hai na....kis GC mai liya hai..mera GC6 mai hai....gaurcity 1..par ab tak salo ne noc sign nahi karayi....bolo apka to paisa aaya hua hai...par sale possesion date to bata deta....i m looking if any one og GC6 got the revised possesion date
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  • Originally Posted by del_sanju
    Gnoida ki chodo. Ye antriksh sanskriti dekha hai?

    I hv never seen any project on such proximity to a river. River land par hi bana lagta hai.

    how can they make it and authorities allow it



    bhai woh ghaziabad hai... wahan ki mitti chaandi ugalti hai..

    yeh Noida/gr. noida ki land hai .. yahan ki mitti sona ugalti hai...

    jahan jitni mithaai .. wahan utne hi zyada keede padhte hain
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  • Joke of the day-12-12-12

    Again a joke of 12-12-12
    Attachments:
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  • Originally Posted by smiley74
    hows the location of aims golf town and its prospects?


    Is AIMS Golf town near dumping ground? Location advantage kaise hua. Abhi aap loge toh vo end ke towers hi denge aapko. Wich towers hv they launched?


    Mahagun itna buri location hai toh kyu log itna lete hai?
    Sare experts iref par hi hai jo arihant, earth towne, n ven gayatri projects me hi lete hai. Aam log toh aise hi jo mahagun me le rhe hai.
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  • Forum mai janta bolti rehti hai ki worst builder, location, tab tak sab kuch bikh jaata hai.
    The point is sometime over discussion is also not good, specially in real estate where timing matter a lot.
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  • Originally Posted by hindustan
    Forum mai janta bolti rehti hai ki worst builder, location, tab tak sab kuch bikh jaata hai.
    The point is sometime over discussion is also not good, specially in real estate where timing matter a lot.

    haan bhai .. maine kitni burai ki verona heights ki .. phir bhi kaafi acha bik gaya ye toh !! :D

    real estate mein there are lot of factors apart from logic, common sense etc ... iske apne alag hee funde hain :D
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  • The biggest joke i am seeing in newspaper is NIGHT safari. Jab authority ke pass road banane ke liye pasie nahi hai, night safari ka lollypop newspaper mai atta rehta hai ki approve ho gaya hai. GNA to Singapore se bhi agge nikal gayi hai ajkal....
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  • Originally Posted by anurag_joshi
    Hey Rahul/Pradyot...
    Any sepcific reason why location is the worst?

    Did not find anything wrong with the location....

    Anurag.



    bad :

    1. may be in 1 km radius of proposed dumping ground... shayad woh kabhi nahi banega..

    2. once constructed it will be somewhat away from gaur gol chakkar.. so lots of traffic jam to be passed before reaching there.. which includes GR noida to ghaziabad traffic.

    Good:

    1. Mahagun will suck just 2 litres of your blood an year compared to 20 litres by supertech and 200 litres by Earth and shubhkaamna type ones...

    2. builder carries a name and would give more premium to an inverster.



    I am also a buyer in mahagun by the way
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  • Nefowa NoidaExtension




    ‎==============================================
    All Buyers meeting on 16th Dec. at 12.00 noon.
    ==============================================
    Dear buyers,
    Apart from old defamed builders others builders have also started harassing existing buyers like us. It is the need of the hour to discuss problems created by builders & their possible solutions in details so that we can make our plan of actions.
    Keeping this in mind all Noida Extension Buyers meeting has been scheduled at Noida Extension Golchakkar on 16th Dec. at 12.00 noon.
    All buyers (effected or unaffected) are requested to attend this meeting.
    Please understand that -
    • We cannot win alone.
    • We cannot win sitting at home.
    • We cannot win without any action.
    • We can win only through our action.
    • Until unless more & more buyers come together a collective action is not possible.
    So wake up guys, join this meeting and help in carving out the plan of actions and its implementation.
    "Others are fighting then what is the need of mine.. there will be no difference with my presence" -- please avoid such attitude and participate with us.

    Meeting details are :
    Time: 16th Dec. at 12.00 noon
    Venue: Noida Extension Gol Chakkar (Gaur City Circle)
    Agenda : Open agenda but related to buyers problem and the solution.

    --- TEAM NEFOWA


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  • अवैध निर्माण न रुका तो स्लम बस्ती बना जाएग

    ग्रेटर नोएडा की गिनती देश के सबसे नियोजित शहरों में होती है। यहां की चौड़ी सड़कें, घनी हरियाली, बड़े-बड़े पार्क व व्यवस्थित सेक्टर यहां की विशेष पहचान हैं। यही वजह है कि लोग यहां की तरफ आकर्षित होते हैं, लेकिन शहर के विकास को अवैध कॉलोनियां ग्रहण लगा रही हैं। जिस तेजी से यहां अवैध कॉलोनियों का जाल बिछ रहा है, उसे कड़ाई से नहीं रोका गया तो ग्रेटर नोएडा में जगह-जगह स्लम बस्ती बन जाएंगी। भविष्य में यह शहर के लिए चांद पर धब्बे के समान साबित होगा। ग्रेटर नोएडा में कोई कोना ऐसा नहीं है, जहां अवैध कॉलोनी नहीं बसाई जा रही हो। कॉलोनाइजर अनजान लोगों को अपने झांसे में फंसाकर ऐसी जमीनें को बेच रहे हैं, जो प्राधिकरण के अधिसूचित क्षेत्र में आती हैं। इतना ही नहीं, कुछ गांवों में अधिग्रहीत जमीन पर भी अवैध कॉलोनी काटी जा रही है। आश्चर्य की बात यह है कि यह सब प्राधिकरण की नाक तले हो रहा है। आला अफसरों के निर्देश के बाद प्राधिकरण के प्रबंधक मौके पर अवैध निर्माण को रोकने के लिए औपचारिकता पूरी कर वापस आ जाते हैं। एक दिन निर्माण रुकने के बाद फिर से शुरू हो जाता है। अवैध निर्माण को हटाने के लिए कई बार प्राधिकरण ने योजना बनाई, लेकिन यह योजना फाइलों से बाहर नहीं निकल पाई। नतीजतन कॉलोनाइजरों के हौसले बुलंद हैं और वह अनजान लोगों को गुमराह कर खूब चांदी काट रहे हैं। सिर्फ नोटिस देकर कर दी जाती है औपचारिकता पूरी
    अवैध निर्माण करने वालों को प्राधिकरण सिर्फ धारा-10 का नोटिस देकर इतिश्री कर लेता है। पिछले तीन माह में साढ़े तीन सौ से अधिक लोगों को नोटिस भेजकर पंद्रह दिन के अंदर स्वयं निर्माण हटाने के निर्देश दिए गए थे। इसके बाद प्राधिकरण ने कार्रवाई की बात कही थी। नोटिस में दी गई समय सीमा बीत चुकी है, लेकिन प्राधिकरण कोई अवैध कॉलोनियों को हटाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है।
    कई इलाके बन चुके हैं स्लम बस्ती
    प्राधिकरण के अधिसूचित क्षेत्र में पड़ने वाले साबेरी, हैबतपुर, सूरजपुर, देवला, कुलेसरा, हल्दौनी व जलपुरा आदि गांवों में सर्वाधिक अवैध निर्माण हुआ है। ये इलाके स्लम बस्ती बन चुके हैं। कॉलोनियों के रास्ते छोटे हैं और इनमें खंड़जे तक नहीं बने हैं। पानी की निकासी के लिए नाली तक नहीं बनी है। कॉलोनियों में रह रहे लोग नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।
    दो विभागों के बीच तालमेल के अभाव मेंअवैध निर्माण को बढ़ावा
    अवैध निर्माण को रोकने की जिम्मेदारी सर्किल प्रभारी के अलावा प्रवर्तन प्रकोष्ठ के पास है। दोनों विभागों में तालमेल का भारी अभाव अवैध निर्माण को बढ़ावा मिल रहा है। दोनों विभाग कार्रवाई करने के बजाय एक-दूसरे की जिम्मेदारी बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। यही कारण है कि अवैध निर्माण नहीं रुक पा रहा है।
    पुलिस बल न मिलना भी है कारण
    प्राधिकरण ने अवैध कॉलोनियों को ध्वस्त करने के लिए कई बार प्रशासन को पत्र लिखकर पुलिस बल उपलब्ध कराने का आग्रह किया, लेकिन प्राधिकरण को पुलिस नहीं मिल सकी। अवैध निर्माण न हटाने का यह भी एक कारण है।
    शीघ्र ध्वस्त होंगी अवैध कॉलोनियां : सीइओ
    सीइओ रमा रमण का कहना है कि प्राधिकरण अवैध निर्माण करने वालों पर सख्ती बरतेगा। निर्माण करने वालों की सूची तैयार कराई जा रही है। उनके खिलाफ थाने में मामला दर्ज कराया जाएगा। इसके बाद प्राधिकरण अभियान चलाकर अवैध निर्माण को ध्वस्त करेगा।
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  • फाइनेंस मिनिस्ट्री का कदम दिलाएगा खुशियो

    नई दिल्ली।। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को हाउसिंग सेक्टर के लिए प्रोविजनिंग नॉर्म्स को आसान बनाने के बारे में सोचने को कहा है। इससे बैंक बायर्स को अट्रैक्टिव रेट्स पर लोन दे सकेंगे, जिससे घरों की डिमांड बढ़ेगी। आरबीआई के मौजूदा नियम के मुताबिक, बैंकों को कमर्शियल रियल एस्टेट में अपने पूरे स्टैंडर्ड एसेट्स के 1 फीसदी के बराबर रकम अपने प्रॉफिट से अलग रखना पड़ता है।

    कमर्शियल रियल एस्टेट में हाउसिंग प्रोजेक्ट्स भी शामिल हैं। इसका मतलब यह है कि अगर कोई बैंक किसी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए 100 रुपए लोन देता है, तो उसे अपने प्रॉफिट से 1 रुपए अलग रखना पड़ेगा। आरबीआई ने यह नियम इसलिए बनाया है ताकि कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़े किसी लोन के डूब जाने पर बैंक के लिए बड़ा संकट पैदा न हो।

    सिक्योर्ड सब-स्टैंडर्ड एसेट के मामले में प्रोविजनिंग को बढ़ाकर नेट इनवेस्टमेंट का 15 फीसदी किया गया है। फाइनेंस मिनिस्ट्री के एक अफसर ने इस बात को सच बताया कि सरकार ने हाउसिंग सेक्टर में तेजी लाने के लिए आरबीआई को सभी मुमकिन ऑप्शंस पर विचार करने को कहा है। उन्होंने कहा कि चर्चा में इस पर भी बातचीत हुई कि सीआरई (कमर्शियल रियल एस्टेट) के तहत लोअर प्रोविजनिंग नॉर्म्स के साथ एक अलग सेगमेंट बनाया जाना चाहिए।
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  • प्रॉपर्टी के धंधे में कालाबाज़ारी का बोलब



    ताज़ा अनुमानों के अनुसार भारत की ‘काली अर्थव्यवस्था’ का आकार, देश के सकल घरेलू उत्पाद के 25 से 50 % तक है.
    ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार सूचकांक के अनुसार 176 देशों में भारत 94वें नंबर पर है जोकि ब्राज़ील और चीन से काफ़ी बदतर है.इसमें भारत का प्रॉपर्टी सेक्टर शायद सबसे बड़ा दोषी है.दिल्ली स्थित लिबर्टी इंस्टीच्यूट के संस्थापक और निदेशक बरुन मित्रा के अनुसार भारत में प्राकृतिक संसधानों समेत हर किस्म के ज़मीनी लेन-देन से हर वर्ष बीस से चालीस अरब अमरीकी डॉलर अवैध धन पैदा होता है.ये जीडीपी के एक से दो प्रतिशत के बराबर का धन है.
    आइए नज़र डालते हैं पांच ऐसे कारणों पर जो रियल इस्टेट में मौजूद काली अर्थव्यस्था के लिए ज़िम्मेदार हैं.
    बेमेल मांग और आपूर्ति

    कालाबाज़ारी की जड़ में



      मकान कम और ख़रीदार ज़्यादा यानी मांग और आपूर्ति के बीच भारी खाई
      ख़रीद फ़रोख़्त पर भारी टैक्स
      ऑनलाइन रिकॉर्डों के अभाव में ख़रीदार और बेचने वालों को पूरे यक़ीन के साथ लेन-देन करने में हिचक
      राज्यों के विवेकाधीन अधिकार जिसने अनुसार खेती वाली ज़मीन को बदलकर व्यावसायिक करवाया जा सकता है.
      एक प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट के लिए 60 स्वीकृतियां लेनी होती हैं. साथ ही उसे 175 डॉक्यूमेंट पेश करने होते हैं. लालफ़ीताशाही की वजह से रिश्वत का चलन





      एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भारतीयी शहरों में साल 2012 के अंत तक ढाई करोड़ से अधिक घरों की ज़रुरत होगी. इसके अलावा व्यावसायिक और कारख़ानों के लिए जो जगह चाहिए सो अलग.
      इसके बावजूद मालिक कीमती ज़मीनों के इस उम्मीद से नहीं बेच रहे हैं क्योंकि शायद भविष्य में इनकी और मोटी क़ीमत मिल पाए.
      ये सारी स्थिति घूस के अवसर प्रदान कर रही है.
      जानकारों का मानना है कि भारत होने अधिकतर रियल इस्टेट सौदों में काला और सफ़ेद धन शामिल होता है. यानि 50 प्रतिशत तक कीमत कानूनी तरीके से और बाक़ी कैश. इस कैश पर कोई टैक्स नहीं दिया होता है.
      ख़रीद फ़रोख़्त पर भारी टैक्स

      मकान के ख़रीदार और बेचने वाले पर भारत में टैक्स बहुत अधिक लगता है.
      ख़रीदार को ज़मीन या मकान की रजिस्टरी के लिए प्रॉपर्टी की कीमत के हिसाब से टैक्स देना होता है. और बेचने वाले को 'कैपिटल गेन टैक्स' देना होता है.
      इसलिए दोनों के पास प्रॉपर्टी को कागज़ों पर कम आंकने की वजह होती है.
      सरकार भविष्य में रजिस्टरी पर टैक्स को पांच प्रतिशत करके इस स्थिति को दुरुस्त करने जा रही है.
      ज़मीन के अपारदर्शी रिकॉर्ड

      भारत में ज़मीन के रिकॉर्ड अपारदर्शी हैं और जिसकी वजह से ये अदालती दाव पेंच में फंसे रहते हैं.
      ऑनलाइन रिकॉर्डों के अभाव में ख़रीदार और बेचने वालों को पूरे यक़ीन के साथ लेन-देन करने में हिचक होती है.
      और इसी वजह से प्रॉपर्टी बेचने वाले कैश में भुगतान की मांग करते हैं. जिसके चलते वही लोग इस बाज़ार में दाख़िल हो सकते हैं जिनके पास काला धन हो.
      राज्यों के विवेकाधीन अधिकार

      हर शहर का मास्टर प्लान होता है लेकिन रसूख़ वाले लोग ज़मीन का 'लैंड यूज़' बदलवा कर मोटी कमाई करते हैं.


      हर शहर या क़स्बे का एक मास्टर प्लान होता है जिसके हिसाब से कृषि, रिहाइश, दफ़्तरों आदि के लिए क्षेत्र नियत होते हैं. लेकिन इनमें स्थानीय अधिकारी अपनी मनमर्जी से फ़ेरबदल कर सकते हैं.
      इसी विवेकाधीन अधिकार के चलते बिल्डर ज़मीन का ‘लैंड यूज़’ बदलवा लेते हैं.
      रॉबर्ट वाड्रा के कथित केस से पता चलता है कि खेती वाली ज़मीन का लैंड यूज़ व्यावसायिक करवाने से उसकी कीमत चौगुनी तक हो सकती है.
      साथ ही भविष्य में बनने वाले हाईवे या मेट्रो लाइन के पास ज़मीन ख़रीद कर भी मोटी रकम कमाई जा सकती है.
      और जिनके पास रसूख़ है वो पहले से ही भविष्य की योजनाएं के बारे में जानकारी रख सकते हैं.
      लालफ़ीताशाही

      भारत में कोई प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए एक बिल्डर को 60 के करीब स्वीकृतियां लेनी होती हैं. साथ ही उसे 175 डॉक्यूमेंट पेश करने होते हैं.
      और ये सब करने के लिए उसे केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के 40 विभागों के पास जाना होता है.
      एक अनुमान के अनुसार एक बिल्डर को अगर ये सब कानूनी तरीके से करना हो तो उसे तीन से चार साल का वक्त लग जाएगा.
      इसकी वजह से बिल्डर सियासतदानों और नौकरशाहों को घूस देते हैं ताकि सारी स्वीकृतियां जल्दी से मिल जाएं.

      भारत में कोई प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए एक बिल्डर को 60 के करीब स्वीकृतियां लेनी होती हैं. साथ ही उसे 175 डॉक्यूमेंट पेश करने होते हैं.
      और ये सब करने के लिए उसे केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के 40 विभागों के पास जाना होता है.
      एक अनुमान के अनुसार एक बिल्डर को अगर ये सब कानूनी तरीके से करना हो तो उसे तीन से चार साल का वक्त लग जाएगा.
      इसकी वजह से बिल्डर सियासतदानों और नौकरशाहों को घूस देते हैं ताकि सारी स्वीकृतियां जल्दी से मिल जाएं.

      भारत में कोई प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए एक बिल्डर को 60 के करीब स्वीकृतियां लेनी होती हैं. साथ ही उसे 175 डॉक्यूमेंट पेश करने होते हैं.
      और ये सब करने के लिए उसे केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के 40 विभागों के पास जाना होता है.
      एक अनुमान के अनुसार एक बिल्डर को अगर ये सब कानूनी तरीके से करना हो तो उसे तीन से चार साल का वक्त लग जाएगा.
      इसकी वजह से बिल्डर सियासतदानों और नौकरशाहों को घूस देते हैं ताकि सारी स्वीकृतियां जल्दी से मिल जाएं.

      भारत में कोई प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए एक बिल्डर को 60 के करीब स्वीकृतियां लेनी होती हैं. साथ ही उसे 175 डॉक्यूमेंट पेश करने होते हैं.
      और ये सब करने के लिए उसे केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के 40 विभागों के पास जाना होता है.
      एक अनुमान के अनुसार एक बिल्डर को अगर ये सब कानूनी तरीके से करना हो तो उसे तीन से चार साल का वक्त लग जाएगा.
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      और ये सब करने के लिए उसे केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के 40 विभागों के पास जाना होता है.
      एक अनुमान के अनुसार एक बिल्डर को अगर ये सब कानूनी तरीके से करना हो तो उसे तीन से चार साल का वक्त लग जाएगा.
      इसकी वजह से बिल्डर सियासतदानों और नौकरशाहों को घूस देते हैं ताकि सारी स्वीकृतियां जल्दी से मिल जाएं.

      भारत में कोई प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए एक बिल्डर को 60 के करीब स्वीकृतियां लेनी होती हैं. साथ ही उसे 175 डॉक्यूमेंट पेश करने होते हैं.
      और ये सब करने के लिए उसे केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के 40 विभागों के पास जाना होता है.
      एक अनुमान के अनुसार एक बिल्डर को अगर ये सब कानूनी तरीके से करना हो तो उसे तीन से चार साल का वक्त लग जाएगा.
      इसकी वजह से बिल्डर सियासतदानों और नौकरशाहों को घूस देते हैं ताकि सारी स्वीकृतियां जल्दी से मिल जाएं.

      भारत में कोई प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए एक बिल्डर को 60 के करीब स्वीकृतियां लेनी होती हैं. साथ ही उसे 175 डॉक्यूमेंट पेश करने होते हैं.
      और ये सब करने के लिए उसे केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के 40 विभागों के पास जाना होता है.
      एक अनुमान के अनुसार एक बिल्डर को अगर ये सब कानूनी तरीके से करना हो तो उसे तीन से चार साल का वक्त लग जाएगा.
      इसकी वजह से बिल्डर सियासतदानों और नौकरशाहों को घूस देते हैं ताकि सारी स्वीकृतियां जल्दी से मिल जाएं.

      भारत में कोई प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए एक बिल्डर को 60 के करीब स्वीकृतियां लेनी होती हैं. साथ ही उसे 175 डॉक्यूमेंट पेश करने होते हैं.
      और ये सब करने के लिए उसे केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के 40 विभागों के पास जाना होता है.
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      इसकी वजह से बिल्डर सियासतदानों और नौकरशाहों को घूस देते हैं ताकि सारी स्वीकृतियां जल्दी से मिल जाएं.
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  • NEFOMA update

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