There are already few threads on this, but I think impact on this on under construction flats is important enough to deserve a new thread. Though news items talks about RTM property, but they are silent for under construction properties. Under construction properties too use Sales Agreement, and as per this verdict transfer of property is illegal even with Sales agreement. Does this verdict apply to under construction properties too? Can any one throw some light on this?
If this impact re-sale of under construction properties it will be huge Change of RE, just try to imagine a world without re-sale of under construction properties.
This discussion will be huge help to potential buyer and seller, so I request all make this issue clear.
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  • Copy of judgement

    I am attaching the copy of judgement , courtsey vKumar from Noida thread.
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  • Thanks for uploading the copy of judgement... I too feel that it will impact resale activity since there are so any brokers and financiers who keep doing multiple resale of a property purely on GPA...
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  • Urgent help

    This is about recent (this Tuesday) Supreme court judgment, which bars property sales on basis Power of attorney/ Will/ Sales Agreement. My question is, is this applicable for re-sale of under construction property ? Is transfer of under construction property legal valid after this judgment ? Please find attached copy of judgment, I am planning to give token amount tomorrow , so please see if you can consult from your lawyer friend or if you can give me any propery lawyer number.
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  • To the best of my knowledge - this has no impact on resale of under construction property -

    I read few pages of the verdict. The context of this case are the scenario where buyers are using PoA/Will/Sale agreement to avoid stamp duty. Stamp duty is anyhow not applicable in under-construction property so this matter can not be related to under construction property.
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  • HOw to proceed with Buying !!

    I have finalised 3 bhk in AWHO society in sector 82 (Vivek Vihar) and have paid token amount.
    AWHO issues NOC only after 3 years of possession. The person from whom i am buying this flat had completed only 2 years.
    This transction was bases on GPA, Will and SA as i cannot go for registery beacuse NOC wont be issued in my name before 3 years (1 year still remaning).
    After SC ruling, should i go ahead with this deal or not ??
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  • Thanks for your reply.
    Originally Posted by naresh_goyal
    To the best of my knowledge - this has no impact on resale of under construction property -

    I read few pages of the verdict. The context of this case are the scenario where buyers are using PoA/Will/Sale agreement to avoid stamp duty. Stamp duty is anyhow not applicable in under-construction property so this matter can not be related to under construction property.
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  • Properties under assignment

    Hi
    Greetings

    I havent read the judgement but would request if anybody has studies impact on properties under assignment??

    Cheers
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  • Tried to read but got lost in legal jargon.
    On face of it, maybe its a good step to bring transparency, and try to curb Black money investments.

    It does say a relevant point as below so genuine GPA seems to be allowed though how they will determine what is genuine and what not will be another saga :

    "These transactions are not to be confused or equated with genuine transactions where the owner of a property grants a power of Attorney in favour of a family member or friend to manage or sell his property, as he is not able to manage the property or execute the sale, personally. These are
    transactions, where a purchaser pays the full price, but instead of getting a deed of conveyance gets a SA/GPA/WILL as a mode of transfer, either at the instance of the vendor or at his own instance."
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  • Yes this judgement is purely for avoiding evasion of stamp duty which is only there in RTM !! under construction flats have little to do with the judgement !!
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  • Earth MD says, the judgement will stop re-sale fo under contrunction

    ??????? ?? ???? ??, ????????? ??? ?? ??- Navbharat Times

    सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों कहा कि जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) के जरिए अचल संपत्ति की बिक्री कानूनी तौर पर सही नहीं है। अचल संपत्ति को सिर्फ रजिस्टर्ड डीड द्वारा ही बेचा जा सकता है। कोर्ट की इस व्यवस्था का प्रॉपर्टी संबंधी सौदों पर क्या असर होगा, इसी का आकलन कर रहे हैं राजेश चौधरी और अमित कुश :

    जीपीए के जरिए प्रॉपर्टी बेचना या फिर मालिकाना हक ट्रांसफर करना सही तरीका नहीं है। सुप्रीम कोर्ट इसे पुख्ता ट्रांसफर नहीं मानती। ऐसे ट्रांजैक्शन के आधार पर म्यूटेशन (दाखिल खारिज) भी नहीं हो सकता। कानूनी जानकार बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला तमाम हाई कोर्ट व निचली अदालतों में बाध्यकारी है और जब तक सरकार इस बारे में कोई कानून नहीं बनाती, तब तक सुप्रीम कोर्ट ने जो व्यवस्था दी है, वह कानून के तौर पर काम करेगी।

    सुप्रीम कोर्ट के वकील डी. बी. गोस्वामी ने बताया कि आने वाले दिनों में जब भी तमाम निचली अदालतों और हाई कोर्ट में प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त संबंधी विवादों का निपटारा होगा, तो इस व्यवस्था के हिसाब से ही जजमेंट होगा। वैसे, दिल्ली में पहले ऐसा कोई कानून नहीं था, जिसके तहत जीपीए न किया जा सके। इसी वजह से जीपीए, विल और इकरारनामा के जरिए प्रॉपर्टी का ट्रांसफर होता रहा है।

    लोग टैक्स बचाने के इरादे से रजिस्ट्री से बचते रहे हैं लेकिन अब इस जजमेंट के बाद अगर कोई जीपीए के जरिए प्रॉपर्टी का मालिकाना हक ट्रांसफर करेगा, तो वह दस्तावेज कानूनी तौर पर वैलिड नहीं होगा।

    जीपीए और एसपीए
    कानूनी जानकार अजय दिग्पाल बताते हैं कि सिर्फ जीपीए के सहारे खरीदी गई प्रॉपर्टी कभी वैलिड दस्तावेज नहीं रही। जीपीए जिसके नाम हुआ है, उसे प्रॉपर्टी का कब्जा भी मिल जाए, तो भी वह प्रॉपर्टी का मालिक नहीं, बल्कि एजेंट होता है। जीपीए के साथ एग्रिमेंट टु सेल (इकरारनामा), रुपये के लेन-देन से संबंधित दस्तावेज और प्रॉपर्टी बेचने वाले की वसीयत खरीदने वाले के फेवर में होना जरूरी था।

    अब तक इन तमाम दस्तावेज के साथ अगर कोई शख्स किसी से प्रॉपर्टी खरीदता था, तो वह एजेंट नहीं, मालिक है और ये तमाम दस्तावेज एक साथ वैलिड दस्तावेज माने जाते हैं। हालांकि प्रॉपर्टी खरीद के मामले में कब्जा महत्वपूर्ण है। ये तमाम दस्तावेज रजिस्टर्ड होने चाहिए। दिल्ली में जीपीए 50 रुपये के स्टांप पर, एसपीए 20 रुपये के स्टांप पर और सेल एग्रिमेंट 50 रुपये के स्टैंप पेपर पर रजिस्टर्ड करवाया जाता है। विल के लिए स्टांप पेपर की जरूरत नहीं होती। बिना रजिस्ट्रेशन के ये दस्तावेज वैलिड नहीं हैं।

    रजिस्टर्ड डीड
    प्रॉपर्टी की खरीद में रजिस्टर्ड डीड ज्यादा वैलिड दस्तावेज माना जाता है। किसी भी राज्य में जो सर्कल रेट सरकार ने फिक्स किया है, उसकी कीमत और सेल एग्रिमेंट में तय मूल्य में से जो ज्यादा होगा, उसकी एक निश्चित फीसदी रकम का स्टांप पेपर खरीदना होता है। जैसे दिल्ली में अगर किसी भी प्रॉपर्टी का खरीद मूल्य 10 लाख रुपये है और सर्कल रेट के हिसाब से उस प्रॉपर्टी की कीमत 5 लाख आंकी जाती है, तो कम-से-कम 5 लाख रुपये के हिसाब से स्टांप खरीदना होगा।

    स्टांप पेपर पर सब रजिस्ट्रार के सामने सेल डीड रजिस्टर्ड होती है। रजिस्टर्ड सेल डीड उन्हीं इलाकों में होती है, जो वैध होते हैं। ऐसे में रजिस्टर्ड डीड होने से यह भी जाहिर होता है कि जिस इलाके में प्रॉपर्टी खरीदी गई है, वह वैध है। वैसे, दिल्ली के छतरपुर, महिपालपुर, रंगपुरी और नजफगढ़ इलाकों में तमाम जीपीए ट्रांजैक्शन होते हैं। यह भी बता दें कि डीडीए प्रॉपर्टी को फ्रीहोल्ड में बदलने की इजाजत तभी देता है जब जीपीए और एग्रिमेंट टु सेल दोनों ही रजिस्टर्ड होते हैं।

    दोनों तरीके होते हैं इस्तेमाल
    गोस्वामी के मुताबिक दिल्ली में अब तक दोनों ही तरीके से प्रॉपर्टी के मालिकाना हक का ट्रांसफर होता रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद अब अगर जीपीए, इकरारनामा और विल के जरिए प्रॉपर्टी के मालिकाना हक को ट्रांसफर किया जाएगा, तो वह कानूनी तौर पर वैलिड दस्तावेज नहीं माना जाएगा। अगर इस मालिकाना हक पर कोई विवाद होता है तो कोर्ट में उन दस्तावेजों के आधार पर मालिकाना हक साबित करना मुश्किल होगा।

    वहीं रजिस्टर्ड डीड हमेशा से पुख्ता दस्तावेज है। दरअसल, जीपीए, विल और इकरारनामा के जरिए प्रॉपर्टी का मालिकाना हक ट्रांसफर करने के बावजूद यह मामला दो पक्षों (क्रेता और विक्रेता) के बीच ही सीमित रहता है लेकिन जब किसी संपत्ति को रजिस्टर्ड डीड के जरिए खरीदा या बेचा जाता है तो रजिस्ट्रार उस दस्तावेज में दस्तखत करता है और इस तरह वह खरीद-बिक्री का साक्षी होता है।

    संपत्ति विवाद होने पर जब ऐसे मामले अदालत जाते हैं, तो रजिस्टर्ड डीड से संबंधित दस्तावेज मान्य होते हैं, जबकि जीपीए को साबित करना होता है। जीपीए करने वाले अगर मुकर जाएं तो उसे साबित करना मुश्किल होगा लेकिन रजिस्टर्ड डीड की गवाह सरकार होती है और इस तरह उसे फिर से साबित करने की जरूरत नहीं होती। लिहाजा प्रॉपर्टी खरीदने के लिए रजिस्टर्ड डीड ही कानूनी तौर पर मान्य दस्तावेज है।

    जजमेंट का असर
    सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट से पहले जिन लोगों ने जीपीए, विल और इकरारनामा के जरिए कोई प्रॉपर्टी अपने नाम ट्रांसफर की है, उनके दस्तावेज कानूनी तौर पर अवैध नहीं माने जाएंगे, लेकिन जजमेंट के बाद अगर कोई जीपीए, विल और इकरारनामा के जरिये प्रॉपर्टी अपने नाम करवाता है तो वह वैलिड दस्तावेज नहीं होगा। जिन लोगों ने पहले जीपीए कराई हुई है और अगर वे उस दस्तावेज को रजिस्टर्ड करवाते हैं तो वह और पुख्ता हो सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में यह भी कहा है कि जीपीए के जरिए हुए प्रॉपर्टी ट्रांसफर के आधार पर म्यूटेशन नहीं हो सकता। ऐसे में रजिस्टर्ड दस्तावेज होने पर ही म्यूटेशन यानी दाखिल-खारिज हो सकता है। दाखिल-खारिज होने के बाद प्रॉपर्टी पर किसी तरह का कोई और दावा नहीं कर सकता। प्रॉपर्टी खरीदने से पहले लोगों को यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि जिससे प्रॉपर्टी खरीदी जा रही है, उसके नाम से रजिस्टर्ड डीड होनी चाहिए। साथ ही पूरी चेन देखना जरूरी है यानी प्रॉपर्टी खरीदने से पहले वकील से उस प्रॉपर्टी की लीगल सर्च रिपोर्ट लेनी चाहिए। रिपोर्ट से साफ हो जाता है कि प्रॉपर्टी विवादित नहीं हैं।

    इसके अलावा अब मार्केट में ट्रांसपैरंसी आएगी, क्योंकि पावर ऑफ अटॉर्नी का इस्तेमाल सिर्फ मुनाफा कमाने के मकसद से किया जा रहा था। एसोटैक लिमिटेड के एमडी संजीव श्रीवास्तव का कहना है कि इनवेस्टर्स किसी प्रॉपर्टी को खरीदकर उसकी रजिस्ट्री कराने की बजाय उस पर पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए अधिकार हासिल कर लेते थे। फिर मोटा मुनाफा हासिल करने के बाद उसे अगली पार्टी को पावर ऑफ अटॉर्नी पर ही बेच देते थे। इस तरह जीपीए के जरिए प्रॉपर्टी को इस्तेमाल करने वाले तो बदलते रहते थे, लेकिन असली मालिक वही रहता था।

    इस खेल में सरकार को करोड़ों के राजस्व का नुकसान होता था। खासतौर पर सेकंडरी मार्केट की हालत सुधरेगी। वैसे, इस फैसले का ज्यादा असर निजी बिल्डरों के फ्लैट की खरीद-फरोख्त पर नहीं पड़ेगा, क्योंकि इस सेग्मेंट में पावर ऑफ अटॉर्नी से खरीदारी का चलन ही नहीं है। एसवीपी के कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन हेड जयंत बरुआ का भी कहना है कि ज्यादातर जगहों पर फ्लैट पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए खरीदने-बेचने का चलन ही नहीं है।

    अर्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर के जेएमडी विकास गुप्ता कहते हैं कि इस फैसले से प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त में काले धन की हिस्सेदारी कम होगी और प्रॉपर्टी को लेकर होने वाले कानूनी केसों की संख्या भी घटेगी। हालांकि इससे रीयल एस्टेट में नकदी की कुछ समस्या खड़ी हो सकती है, क्योंकि थोड़े समय के लिए प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त में कमी आने का डर है।

    अब अंडरकंस्ट्रक्शन फ्लैट को आगे नहीं बेचा जा सकेगा। किसी भी फ्लैट की रजिस्ट्री कंप्लीशन सर्टिफिकेट के बिना नहीं कराई जा सकती, यानी इससे पहले इसे फ्री होल्ड में नहीं बदला जा सकता। अभी तक ऐसे फ्लैटों को जीपीए के माध्यम से बेचा जा रहा था, जो अब संभव नहीं होगा। इस फैसले के बाद फ्रीहोल्ड प्रॉपर्टी के दाम बढ़ सकते हैं, जबकि लीजहोल्ड प्रॉपर्टी के दामों में कमी आ सकती है।

    सर्कल और मार्केट रेट बराबर होना जरूरी
    पावर ऑफ अटॉर्नी से खरीद-फरोख्त का खेल मुख्य रूप से ऐसे इलाकों में प्रॉपर्टी लेने के लिए होता है, जहां बैंक लोन देने से कतराते हैं। इसी कारण इन इलाकों की प्रॉपर्टी में ज्यादातर ब्लैक मनी से लेन-देन होता है। प्रॉपर्टी मार्केट के सूत्रों के मुताबिक, केवल पावर ऑफ अटॉर्नी से ट्रांजैक्शन खत्म करने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि पावर ऑफ अटॉर्नी की प्रैक्टिस लाल डोरा और अवैध बस्तियों में है। अगर आम आदमी के लिए प्रॉपर्टी बाजार की बात करें, तो ट्रांसपैरंसी लाने के लिए उससे ज्यादा जरूरत है सर्कल रेट लगातार रिवाइज करने की।

    सरकार को सर्कल रेट में बढ़ोतरी करके मार्केट रेट और सर्कल रेट के बीच का अंतर खत्म करना चाहिए। मौजूदा वक्त में इन दोनों रेटों में 10-40 फीसदी का अंतर है। अभी तक बिल्डर एक ही तरह का फ्लैट किसी व्यक्ति को 50 लाख रुपये का बेचता है, तो वही फ्लैट किसी दूसरे को 30 लाख में दे देता है। ऐसा दोनों रेटों में अंतर के कारण ही हो पाता है। अगर यह अंतर नहीं होगा, तो बिल्डर चाहकर भी फ्लैट की अलग-अलग कीमत नहीं ले पाएगा, जिससे ब्लैक मनी का ट्रांजैक्शन रुकेगा। सर्कल रेट से कम में फ्लैट बेचा नहीं जा सकेगा और वह मार्केट रेट के बराबर होने से कीमत बढ़ने और काला धन लेने की गुंजाइश भी नहीं बचेगी।
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  • Thats bad news for Investors.

    Exit route is blocked completely -- now only people who want for self use or has the capacity to pay the whole amount will buy.
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  • As per my understanding, underconstruction properties won't be affected at all. As the builder doesn't issue a POA or asks the buyer to get it registered when the project is launched or about to be launched.
    Similarly when the buyer of under constrcution property wants to sell it to someone it's merely a change in record or change in BBA for the builder and nothing else.
    Obviously certain builders do ask for some money for transfer to happen but thats not as per the POA or registration requirements. Registery is needed only when the possession has been granted or about to be given.

    This judgement is going to impact the places where we have only the POA route as of now to evade stamp duty and CG tax (long term/short term). This would mean areas in lal dora and unauthorized colonies will have a tough time and prices may fall until....

    1. There is a new law created in parliament to clear the situation as lot of ministers and MLA's/MP's get support from the people living in these colonies who are in mass voting category.
    2. This will stop the resale of land/flats in unauthorized colonies altogether which means there will be huge difference in prices in these areas as compared to the freehold areas. Middle class (typically lower middle class endusers) might flock to these areas due to attractive pricing and overburden the existing burdened infrastructure.
    3. the promise of the state govts specifically Delhi govt to regularize unauthorized colonies will be under pressure now. The residents will push govt to regularize which the govt is refraining even after announcements.

    Just my POV strictly...
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  • Is there any Lawyer around who can clarify on the status of under construction properties ?

    vKumar1 Bhai, aap bhi galat time pe suspend ho gaye ho .
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  • You are correct that POA is not part of process of underconstruction re-sale, but what about Sale Agreement, isn't that a part of it? SC has made transfer of property invalid through SA too. Does that not apply to under-construction re-sale ?

    SA is the biggest grey area, which is bothering me. I am not at all concern about POA and will.


    Originally Posted by smart111
    As per my understanding, underconstruction properties won't be affected at all. As the builder doesn't issue a POA or asks the buyer to get it registered when the project is launched or about to be launched.
    Similarly when the buyer of under constrcution property wants to sell it to someone it's merely a change in record or change in BBA for the builder and nothing else.
    Obviously certain builders do ask for some money for transfer to happen but thats not as per the POA or registration requirements. Registery is needed only when the possession has been granted or about to be given.

    This judgement is going to impact the places where we have only the POA route as of now to evade stamp duty and CG tax (long term/short term). This would mean areas in lal dora and unauthorized colonies will have a tough time and prices may fall until....

    1. There is a new law created in parliament to clear the situation as lot of ministers and MLA's/MP's get support from the people living in these colonies who are in mass voting category.
    2. This will stop the resale of land/flats in unauthorized colonies altogether which means there will be huge difference in prices in these areas as compared to the freehold areas. Middle class (typically lower middle class endusers) might flock to these areas due to attractive pricing and overburden the existing burdened infrastructure.
    3. the promise of the state govts specifically Delhi govt to regularize unauthorized colonies will be under pressure now. The residents will push govt to regularize which the govt is refraining even after announcements.

    Just my POV strictly...
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  • Originally Posted by smart111
    As per my understanding, underconstruction properties won't be affected at all. As the builder doesn't issue a POA or asks the buyer to get it registered when the project is launched or about to be launched.
    Similarly when the buyer of under constrcution property wants to sell it to someone it's merely a change in record or change in BBA for the builder and nothing else.
    Obviously certain builders do ask for some money for transfer to happen but thats not as per the POA or registration requirements. Registery is needed only when the possession has been granted or about to be given.

    This judgement is going to impact the places where we have only the POA route as of now to evade stamp duty and CG tax (long term/short term). This would mean areas in lal dora and unauthorized colonies will have a tough time and prices may fall until....

    1. There is a new law created in parliament to clear the situation as lot of ministers and MLA's/MP's get support from the people living in these colonies who are in mass voting category.
    2. This will stop the resale of land/flats in unauthorized colonies altogether which means there will be huge difference in prices in these areas as compared to the freehold areas. Middle class (typically lower middle class endusers) might flock to these areas due to attractive pricing and overburden the existing burdened infrastructure.
    3. the promise of the state govts specifically Delhi govt to regularize unauthorized colonies will be under pressure now. The residents will push govt to regularize which the govt is refraining even after announcements.

    Just my POV strictly...


    Regarding Under constrcution proprties I quote from Financial Express article

    "Even in the case of under-construction property, one has to get the agreement/ deed registered without which the title would remain with the original owner, as court said “it will not treat such transactions as completed”. Remember that now it would be difficult to get relief from a court, by the buyer, if the transaction/exchange of money is based on unregistered agreement as the title would stay with the seller until it is transferred to the new owner."


    What do you guys interpret from this?

    The full article can be read as

    Real estate deals to get a reality check
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