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एनसीआर के रेंटल मार्केट में सुस्ती - Oversupply Effect

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एनसीआर के रेंटल मार्केट में सुस्ती - Oversupply Effect

Last updated: July 4 2011
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    एनसीआर के रेंटल मार्केट में सुस्ती - Oversupply Effect, it is just the Starting...
    4 Jul 2011, 1140 hrs IST, इकनॉमिक टाइम्स


    एनसीआर के रेंटल बाजार में हालात बिल्कुल बदल गए हैं, जहां पूरे बाजार में किराएदार फायदे की स्थिति में दिख रहे हैं। कुछ साल पहले तक प्रॉपर्टी के मालिक मोटा किराया वसूलने के साथ ही किराए की सभी शर्तें तय करते थे और इन शर्तों को बिना किसी सवाल के किराएदार को मानना पड़ता था। उस समय रेजिडेंशियल और कमर्शियल, दोनों सेगमेंट में किराएदार को क्या करना है, क्या नहीं करना है, जैसी कई शर्तें होती थीं। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों ने पूरा तानाबाना ही बदल दिया है।

    राजधानी के कई इलाकों में कमर्शियल स्पेस मांग से ज्यादा उपलब्ध दिख रहा है। ऐसे में छोटी-बड़ी कंपनियों के लिए बेहतर और सस्ती जगह जाने के विकल्प कई गुना बढ़ गए हैं। इससे प्रॉपर्टी के मालिकों के लिए बहुत मुश्किल हालात बन गए हैं क्योंकि वे किसी भी तरह अपने मौजूदा किराएदार को खोना नहीं चाहते हैं। आज की बदली परिस्थितियों में अच्छा किराएदार खोज पाना भी टेढ़ी खीर है। और अब अपनी कीमत समझकर कुछ किराएदार भी परिस्थिति का फायदा उठाने लगे हैं।

    रियल्टी मार्केट पर नजर रखने वाले जानकारों की मानें, तो आज किराएदार किसी राजा से कम नहीं हैं। ये 10-15 फीसदी तक किराया कम करा लेते हैं और यह चलन एनसीआर में तेजी से बढ़ रहा है। आईएलडी ग्रुप के डायरेक्टर नुजहत आलिम ने कहा, 'इसमें कोई संदेह नहीं कि यह किराएदारों के लिए बेहतरीन समय है, यहां तक कि रेजिडेंशियल सेगमेंट में भी। किराएदारों के पास पर्याप्त विकल्प हैं, ऐसे में ये शासन करने की स्थिति में हैं। तेजतर्रार किराएदार तो कुछ साल में मकान मालिक तक बन जाते हैं। वे जिस घर में किराए पर रह रहे होते हैं, उसे बाद में खरीद लेते हैं।'

    एस एस एसोसिएट्स के सुशील श्रीवास्तव का कहना है कि जिन कंपनियों को अपने मौजूदा ऑफिस स्पेस से कोई शिकायत नहीं होती है, वे ऐसा कदम उठाती हैं और प्रॉपर्टी की शर्तों के मामले में हावी हो जाती हैं। कोलकाता की एक जूट कंपनी का ऑफिस नेहरू प्लेस में था। उसने हाल ही में इस ट्रिक का इस्तेमाल किया। कंपनी नेहरू प्लेस के एक टावर में पिछले 15 सालों से अपना ऑफिस चला रही है। हाल ही में कंपनी ने ऑफिस एरिया के मालिक के साथ किराए की शर्तें फिर से तय कीं।

    प्रॉपर्टी के मालिक ने भी बिना ज्यादा सवाल किए किराया 15 फीसदी प्रति वर्ग फुट घटा दिया। काजोल मखीजानी कहती हैं कि प्रॉपर्टी के मालिक के पास बिना देर किए किराया घटाने के सिवा कोई विकल्प नहीं था क्योंकि नेहरू प्लेस में इतनी ही कीमत पर विकल्पों की कमी नहीं हैं। कई कंपनियों ने इसके चलते अपने ऑफिस का लोकेशन बदलने का विचार छोड़ दिया है। जब वे अपने पुराने स्पेस का किराया कम करा सकते हैं, तो दूसरी जगह शिफ्ट होना कोई समझदारी भरा कदम नहीं हैं।

    भीकाजी कामा प्लेस में एक बिल्डिंग को लेकर दूसरा ही मामला सामने आया है। भीकाजी कामा प्लेस में भी मांग से ज्यादा प्रॉपर्टी की उपलब्धता की स्थिति बन गई है। ऐसे में मुंबई की एक कंपनी ने अपना रेंट एग्रीमेंट लैप्स होने पर प्रॉपर्टी मालिक को नोटिस भेजा, जिसमें लिखा था कि कंपनी के पास इसी एरिया में कई दूसरे ऑफर हैं और कंपनी एक महीने में ऑफिस खाली कर देगी। प्रॉपर्टी के मालिक ने किराए में अच्छी-खासी छूट दी और डील पक्की हो गई।

    मालिक ने माना कि उसके पास मौजूदा किराएदार को बनाए रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं है क्योंकि बेहतर डील पर किसी और को खोज पाना काफी मुश्किल है। दूसरी ओर, किराएदार के पास चुनने के लिए सस्ते विकल्पों की कोई कमी नहीं है। कैलाशनाथ खन्ना प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के संजय खन्ना का कहना है, 'कोई भी प्रॉपर्टी का मालिक अपनी प्रॉपर्टी लंबे समय तक खाली नहीं देखना चाहता है। अगर वह ऐसा करता है, तो उसे करीब चार महीनों तक इंतजार करना पड़ता है और इस बीच मेंटेनेंस, बिजली और पानी का बिल खुद ही भरना होता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसका सामना कोई मकान मालिक नहीं करना चाहता, चाहे वह कितना ही अमीर क्यों न हो। दूसरी ओर अगर उसके पास कोई किराएदार है, तो ऐसे बिल चुकाना उसकी जिम्मेदारी नहीं होती, उसे सिर्फ प्रॉपटीर् टैक्स भरना होता है।'

    एक अन्य प्रॉपर्टी मालिक एस के कपूर का कहना है कि कमशिर्यल प्रॉपर्टी, कोठी या पॉश इलाके में फ्लैट के मालिक ऐसी स्थिति से बचने की कोशिश करते हैं, जब किराएदार तय समय से पहले घर खाली कर चला जाता है। वह अच्छी तरह से जानते हैं कि नया किराएदार ढूंढ पाना एक मुश्किल और महंगा काम है। यह सबसे बड़ी वजह है कि मकान मालिक किराएदारों की मांगों के आगे झुक रहे हैं।

    कपूर कहते हैं कि अगर एग्रीमेंट में 'लॉक इन पीरियड' के बारे में न लिखा हो, तो किराएदार बीच में ही घर छोड़ कर चले जाते हैं। 'लॉक इन पीरियड' से यह सुनिश्चित हो जाता है कि न मकान मालिक समय से पहले किराएदार को जाने को कह सकता है और न ही किराएदार तय समय से पहले घर छोड़ सकता है। ऐसी शर्त न होने पर कोई भी पक्ष दूसरे के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है। ऐसी ही स्थिति रेजिडेंशियल मार्केट में भी खड़ी हो रही है।
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