NDTV debate done today:

NDTV Profit's Manisha Natarajan talks to Samir Jasuja, founder and CEO of PropEquity, Getambar Anand ,ATS owner & vice president at CREDAI National and Vineet Relia, COO at Sare Group about the state of completion of residential projects in metros across the country.

Today's property show: Why builders don't deliver flats on time

Cheers,
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  • Except Dominos Pizza:D, Nothing is delivered in time:bab (59):
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  • Originally Posted by cookie
    Except Dominos Pizza:D, Nothing is delivered in time:bab (59):


    Builders should also start a policy of time pe delivery varna flat free aur paisa wapis ( like Dominos :D)
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  • Builders take 95% money when they had spent 25%. This surplus is used for buying land and developing another project rather than completing the existing one. Again they collect 95% at a stage when they had spent 25%, and attempt to develop another project and the story goes on.

    In satyug the peanlty clause was Rs. 5 psf/month , in treta the rate was Rs. 5/sqft/month in dwapar the rate was Rs. 5 psf/month, and now in kalyug ALSO the rate is STILL Rs. 5 psf/month.

    In all other yuga the penalty was actually paid in case of delay, in kalyug you are shown clause 3.1.7 para - 4 of BBA as enough reason for not even to pay the measly Rs. 5 psf/month
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  • I think we all have to make everyone aware and blacklist the builders who won't deliver there project in time.
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  • Originally Posted by gudguy
    I think we all have to make everyone aware and blacklist the builders who won't deliver there project in time.

    then? kya hoga?
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  • the anchor made an interesting point..the average delay of properties is abt 9.5 mths...NCR supposedly is the worst since the projects undertaken are huge running into several acres...
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  • The RE business model is totally flawed. Builders pre-launch the project without even basic approvals. some even without land registry. Then they finish the plans as per demand.

    The BBA and all documentation are one sided. 90% money collected at 30% expenditure. so no incentive to deliver in time. NCR junta too is very liberal. continues to patronize builders having extremely poor track record.
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  • Originally Posted by gudguy
    I think we all have to make everyone aware and blacklist the builders who won't deliver there project in time.


    when almost 99% builders are not on time so it'll be hard to make such list. so better we should make the list of builders who give delivery on time.

    two major reasons of delay
    1. projects launched without getting any approval
    2. construction starts only after selling 30-40% flats. because builders solely rely on investors/buyers money. simple funda OPM(other peoples money)
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  • ... and we still say Customer is the KING!!
    ... there is huge over supply in the market!!
    ... market going to crash tomorrow!!

    Unfortunately, as a customer, you have absolutely NO OPTION. Everyone, including your builders knows that very well and hence "Take it or Leave it"
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  • Originally Posted by Meghna
    Builders take 95% money when they had spent 25%. This surplus is used for buying land and developing another project rather than completing the existing one. Again they collect 95% at a stage when they had spent 25%, and attempt to develop another project and the story goes on.

    In satyug the peanlty clause was Rs. 5 psf/month , in treta the rate was Rs. 5/sqft/month in dwapar the rate was Rs. 5 psf/month, and now in kalyug ALSO the rate is STILL Rs. 5 psf/month.

    In all other yuga the penalty was actually paid in case of delay, in kalyug you are shown clause 3.1.7 para - 4 of BBA as enough reason for not even to pay the measly Rs. 5 psf/month



    Yes.. in most of cases.. builder already taken 60-65% amount till 4-7th floors... and then invest in other projects.. This is what I got feedback from one of top guy working with Noida builder.
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  • and therefore the builder has no clue on when he would be alb to complete it? so he just picks a number and puts it in the BBA?

    Bigger projects have economy of scale, hence ideally, the builder of such a project should be able to get the services of the best project planners, architects and big contractors...shifting it from a cottage industry league to an efficient business...

    clearly, the capability to complete the projects on time exist, the intent does not.

    Everyone knows that delaying projects is the cheapest and easiest source of funding available today. And you don't even have to mortgage anything for this loan...

    The day when we have a regulator, who ensures that the penalty is high enough to make this funding more expensive than the other sources, a lot of this will automatically get corrected...

    Nitin

    Originally Posted by prakashjh24
    the anchor made an interesting point..the average delay of properties is abt 9.5 mths...NCR supposedly is the worst since the projects undertaken are huge running into several acres...
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  • Something interesting, i had read .

    Not exactly related, but good enough in a way -


    Customer is King, Kings Don



    Originally Posted by gharondabhai
    ... and we still say Customer is the KING!!
    ... there is huge over supply in the market!!
    ... market going to crash tomorrow!!

    Unfortunately, as a customer, you have absolutely NO OPTION. Everyone, including your builders knows that very well and hence "Take it or Leave it"
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  • प्रोजेक्ट में विलंब होने पर बिल्डर देंगे पेनाल्टी


    जब प्रोजेक्ट में हो विलंब
    रेसीडेंशियल प्रोजेक्ट में बुकिंग कराते समय बायर-सेलर एग्रीमेंट में एक पेनाल्टी क्लॉज होता है जिसमें स्पष्ट तौर पर इस बात का जिक्र होता है कि अगर प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं होता है तो बिल्डर किस प्रकार इसकी क्षतिपूर्ति करेगा।

    खरीदारों को इस बात की तस्दीक कर लेनी चाहिए कि प्रोजेक्ट पूरा होने की तारीख बायर-सेलर एग्रीमेंट में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है ताकि अगर प्रोजेक्ट पूरा होने में जरूरत से ज्यादा विलंब हो तो बिल्डर से मुआवजा ले सकें।
    खरीदार के पास दस्तावेजी सबूत होने के बावजूद अगर बिल्डर या डेवलपर प्रोजेक्ट के पूरा होने में देरी की दशा में खरीदार को एग्रीमेंट के हिसाब से क्षतिपूर्ति नहीं करता है तो खरीदार कंज्यूमर कोर्ट का सहारा ले सकते हैं।

    रेसीडेंशियल प्रोजेक्ट के संपन्न होने में विलंब के कई कारण हो सकते हैं। पर इसकी जिम्मेदारी बिल्डरों और डेवलपरों की है। एक ग्राहक के तौर पर आप विलंब होने के एवज में उनसे हर्जाना ले सकते हैं।

    न ये प्रोजेक्ट में घर बुक करवाते हुए अपने आशियाना का सपना पूरा करने जा रहे अधिकतर लोग यह मान कर चलते हैं कि दो या तीन साल बाद हमारा परिवार अपने घर में होगा। लेकिन अगर प्रोजेक्ट पूरा होने में विलंब हुआ तो इस सपने को न केवल हकीकत बनने में देर होती है बल्कि कहीं न कहीं आर्थिक घाटा भी उस व्यक्ति को झेलना होता है जिसने घर की बुकिंग कराई है।


    प्रोजेक्ट में विलंब
    दिल्ली स्थित रियल एस्टेट रिसर्च फर्म ऑगटिक्स रिसर्च के मैनेजिंग डायरेक्टर मनोज मिश्रा के अनुसार अकेले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में 80-85 प्रतिशत प्रोजेक्ट छह महीने से ज्यादा विलंबित हैं। बिल्डर भले ही आपको वक्त पर घर का पजेशन देने का सपना दिखाएं पर प्रोजेक्ट पूरा होने में छह महीने से एक साल तक की देरी तो आजकल आम बात है।


    हालांकि इससे निवेशक को हर लिहाज से नुकसान उठाना पड़ता है। कई बार तो देरी होने के बावजूद बिल्डर की ओर से खरीदार को मुआवजा भी नहीं मिल पाता है। रियल एस्टेट डाटा एंड एनालिटिक्स फर्म प्रॉप इक्विटी के मुताबिक साल 2011 में गुडग़ांव के 16 प्रोजेक्ट में से 10 प्रोजेक्ट में देरी हुई। ग्रेटर नोएडा की बात करें ग्रेटर नोएडा के कुल 9 प्रोजेक्ट में से 55 फीसदी को पूरा करने में बिल्डरों ने देरी की। इसके अलावा नोएडा के भी कुछ प्रोजेक्ट समय पर पूरे नहीं हो पाए।


    बिल्डरों की सफाई
    बिल्डरों की माने तो उनकी ओर से इस बात की पूरी कोशिश की जाती है कि प्रोजेक्ट समय पर पूरा किया जाए। हालांकि, किसी न किसी वजह से प्रोजेक्ट लटक जाते हैं जिससे उनकी लागत भी बढ़ती है। क्रेडाई-एनसीआर के वाइस प्रेसिडेंट और आम्रपाली ग्रुप के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर अनिल शर्मा के मुताबिक प्रोजेक्ट पूरा होने में देरी की सबसे बड़ी वजह है दिल्ली-एनसीआर में मजदूरों की कमी।


    सिंगल विंडो क्लियरेंस के अभाव में हमें कई दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ जाते हैं जिसकी वजह से प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं हो पाता। हालांकि देरी होने पर ज्यादातर बिल्डर्स बायर्स को रिफंड करने की कोशिश करते हैं।


    मार्च 2010 से अब तक ब्याज दरों में करीब 3 फीसदी तक इजाफे और मांग में आई सुस्ती के कारण बिल्डरों को फंड की भारी कमी झेलनी पड़ रही है जो प्रोजेक्ट में देरी की बड़ी वजह है। नेशनल रियल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल (नारेडको) के डायरेक्टर जनरल आर. आर. सिंह ने बताया कि रियल एस्टेट सेक्टर अभी तक 2008 की आर्थिक सुस्ती से बाहर नहीं निकल सका है जिसकी वजह बिल्डरों को प्रोजेक्ट पूरा करने में दिक्कत आ रही है।


    नतीजतन 2008 से लेकर अब तक के दौरान पूरा होने वाले प्रोजेक्ट में खासतौर पर देरी हुई है। हालांकि सेक्टर को राहत देने के लिए डेट रिस्ट्रक्चरिंग की गई जिससे डेवलपर्स को फौरी तौर पर राहत जरूर मिली लेकिन अभी भी इस सेक्टर में सुस्ती है।


    खरीदारों को मुआवजे का प्रावधान
    सिंह के मुताबिक प्रोजेक्ट पूरा होने में देरी होने की स्थिति में वैसे तो रियल एस्टेट कंपनियां खरीदारों को मुआवजा दे रही हैं। यह बात और है कि यह पूरी तरह से बायर-सेलर एग्रीमेंट पर निर्भर करता है। प्रोजेक्ट में देरी होने की स्थिति में आम तौर पर बायर्स को 5 रुपये प्रति वर्ग फुट प्रतिमाह की दर से भुगतान किया जाता है। कुछ कंपनियां कुल जमा राशि का एक निर्धारित फीसदी मुआवजे के तौर पर बायर्स को देती हैं।


    खरीदारों के सामने विकल्प
    नोएडा एक्सटेंशन में चल रहे विवाद की वजह से भी कई बिल्डरों का प्रोजेक्ट पूरा होने में देरी हुई है। हालांकि इस मसले में बायर्स को बिल्डरों की ओर से कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। गौर संस के डायरेक्टर विपिन मोदी की माने तो अभी तक उनकी कंपनी के सभी प्रोजेक्ट समय पर पूरे होते आए हैं।


    कुछ प्रोजेक्ट अटके जरूर हैं लेकिन वह भी नोएडा एक्सटेंशन में चल रहे विवाद की वजह से। यह प्रोजेक्ट लटकने की असाधारण वजह है ऐसे में बायर्स को किसी भी तरह का मुआवजा नहीं दिया जाएगा।


    उन्होंने कहा कि बिल्डर बायर को जो एलॉटमेंट लेटर जारी करता है उसमें इस बात का जिक्र होता है कि देरी होने की स्थिति में कितना मुआवजा दिया जाएगा। यदि बायर अपनी ओर से समय पर सारी किस्त चुकाता है और डिफॉल्ट नहीं करता है तो उसे बिल्डर एग्रीमेंट की शर्त के हिसाब से निश्चित तौर पर मुआवजा देता है।


    सभी नियम और शर्तें पूरी करने के बावजूद अगर बिल्डर मुआवजा नहीं देता है तो बायर इसकी शिकायत कंज्यूमर कोर्ट में कर सकता है। मुआवजे की रकम भी काफी कम है। प्रोजेक्ट में देरी के लिए बिल्डर बायर्स को मुआवजे की रकम नकद में नहीं देते हैं। इसका निबटारा आखिरी किश्त में कर लिया जाता है।


    क्या हो खरीदारों की नीति
    इन सब के बावजूद अगर खरीदार थोड़ी सूझ-बूझ के साथ काम करें तो घर खरीदते वक्त उनकी दिक्कतें कम होंगी। ऑगटिक्स रिसर्च के मिश्रा के अनुसार खरीदारों को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि प्रोजेक्ट के संपन्न होने की तिथि स्पष्ट रूप से एग्रीमेंट में वर्णित है। कई बार यह मोटे तौर पर लिखा गया होता है कि कंस्ट्रक्शन शुरू होने के दो साल में प्रोजेक्ट पूरा हो जाएगा या बुकिंग की तारीख से चार साल में पूरा हो जाएगा। यहां प्रोजेक्ट के पूरे होने की तारीख नहीं होती और खरीदारों को विलंब की स्थिति में खरीदारों को मुआवजे का दावा करने का मजबूत आधार नहीं मिल पाता।


    बुकिंग से पहले के होमवर्क
    प्रॉप इक्विटी के सीईओ समीर जसूजा के अनुसार घर खरीदते वक्त खरीदार को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि वे घर की ओनरशिप अपने नाम पर जरूर ट्रांसफर करवा लें जिससे आने वाले वक्त में उसे कोई दिक्कत न हो। साथ ही इस बात का ख्याल रखना भी बेहद जरूरी है कि खरीदार और बिल्डर के सभी दस्तावेज पूरे हों जिससे आप घर खरीदने के लिए आश्वस्त हो सकें। घर खरीदने से पहले जमीन के मालिकाना हक की जांच करनी भी बेहद जरूरी है।


    घर खरीदने के बाद अगर कोई विवाद समाने आता है तो प्रोजेक्ट पूरा होने में निश्चित तौर पर देरी होगी और आपका बजट बिगड़ेगा। बायर को बिल्डिंग का परमिट की भी जांच करनी चाहिए। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर किसी बैंक ने प्रोजेक्ट को अप्रूव किया है और इसके लिए लोन दे रहा है तो समझिए की आपका प्रोजेक्ट पूरी तरह से सुरक्षित है।

    -Bhasker news
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